Hindi Moral Story For Class 8

Hindi Moral Story For Class 8 - Short Moral Story In Hindi, Stories For Kids in Class 8. Persuasive Moral Story Assists you with understanding the Basic Concept of life and how to conquer it. हिंदी की मोरल कहानियां बेहतर पढ़ाई करने में मदद करता है। हिंदी नैतिक कहानी में ५० से अधिक कहानियां कक्षा 1 से 10 तक हैं।

    Hindi Moral Story For Class 8 | आहार का कुप्रभाव

    "किसी नगर में एक भिखारिन एक गृहस्थी के यहाँ नित्य भीख मांगने जाती थी। गृहिणी नित्य ही उसे एक मुठ्ठी चावल दे दिया करती थी। यह बुढ़िया का दैनिक कार्य था और महीनों से नहीं कई वर्षों से यह कार्य बिना रुकावट के चल रहा था।


     एक दिन भिखारिन चावलों की भीख खाकर ज्यों ही द्वार से मुड़ी,गली में गृहिणी का ढाई वर्ष का बालक खेलता हुआ दिखाई दिया। बालक के गले में एक सोने की जंजीर थी। बुढ़िया की नीयत बदलते देर न लगी। इधर-उधर दृष्टि दौड़ाई,गली में कोई और दिखाई नहीं पड़ा। बुढ़िया ने बालक के गले से जंजीर ले ली और चलती बनी।

    Hindi Moral Story For Class 8
    Hindi Moral Story For Class 8


     घर पहुँची,अपनी भीख यथा स्थान रखी और बैठ गई। सोचने लगी,"जंजीर को सुनार के पास ले जाऊंगी और इसे बेचकर पैसे खरे करुँगी।" यह सोचकर जंजीर एक कोने में एक ईंट के नीचे रख दी।


      भोजन बनाकर और खा पीकर सो गई। प्रातःकाल उठी,शौचादि से निवृत्त हुई तो जंजीर के सम्बन्ध में जो विचार सुनार के पास ले जाकर धन राशि बटोरने का आया था उसमें तुरंत परिवर्तन आ गया।


     बुढ़िया के मन में बड़ा क्षोभ पैदा हो गया। सोचने लगी-"यह पाप मेरे से क्यों हो गया? क्या मुँह लेकर उस घर पर जाऊंगी?" सोचते-सोचते बुढ़िया ने निर्णय किया कि जंजीर वापिस ले जाकर उस गृहिणी को दे आयेगी। बुढ़िया जंजीर लेकर सीधी वहीं पहुँची। द्वार पर बालक की माँ खड़ी थी।


     उसके पांवों में गिरकर हाथ जोड़कर बोली-"आप मेरे अन्नदाता हैं। वर्षों से मैं आपके अन्न पर पल रही हूँ। कल मुझसे बड़ा अपराध हो गया,क्षमा करें और बालक की यह जंजीर ले लें।"


    जंजीर को हाथ में लेकर गृहिणी ने आश्चर्य से पूछा-"क्या बात है? यह जंजीर तुम्हें कहाँ मिली?" भिखारिन बोली-"यह जंजीर मैंने ही बालक के गले से उतार ली थी लेकिन अब मैं बहुत पछता रही हूँ कि ऐसा पाप मैं क्यों कर बैठी?"


    गृहिणी बोली-"नहीं, यह नहीं हो सकता। तुमने जंजीर नहीं निकाली। यह काम किसी और का है,तुम्हारा नहीं। तुम उस चोर को बचाने के लिए यह नाटक कर रही हो।"


    "नहीं,बहिन जी,मैं ही चोर हूँ। कल मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी। आज प्रातः मुझे फिर से ज्ञान हुआ और अपने पाप का प्रायश्चित करने के लिए मैंने आपके सामने सच्चाई रखना आवश्यक समझा," भिखारिन ने उत्तर दिया। गृहिणी यह सुनकर अवाक् रह गई।


    भिखारिन ने पूछा-"क्षमा करें,क्या आप मुझे बताने की कृपा करेंगी कि कल जो चावल मुझे दिये थे वे कहाँ से मोल लिये गये हैं।"


    गृहिणी ने अपने पति से पूछा तो पता लगा कि एक व्यक्ति कहीं से चावल लाया था और अमुक पुल के  पास बहुत सस्ते दामों में बेच रहा था। हो सकता है वह चुराकर लाया हो। उन्हीं चोरी के चावलों की भीख दी गई थी।


    भिखारिन बोली-"चोरी का अन्न पाकर ही मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी और इसी कारण मैं जंजीर चुराकर ले गई। वह अन्न जब मल के रूप में शरीर से निकल गया और शरीर निर्मल हो गया तब मेरी बुद्धि ठिकाने आई और मेरे मन ने निर्णय किया कि मैंने बहुत बड़ा पाप किया है। मुझे यह जंजीर वापिस देकर क्षमा माँग लेनी चाहिए।"


    गृहिणी तथा उसके पति ने जब भिखारिन के मनोभावों को सुना तो बड़े अचम्भे में पड गये। भिखारिन फिर बोली-"चोरी के अन्न में से एक मुठ्ठी भर चावल पाने से मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो सकती है तो वह सभी चावल खाकर आपके परिवार की क्या दशा होगी,अतः, फेंक दीजिए उन सभी चावलों को।" गृहिणी ने तुरन्त उन चावलों को बाहर फेंक दिया।"


    Hindi Moral Story For Class 8 | सेवा धर्म

    एक साधु स्वामी विवेकानन्द जी के पास आया।अभिवादन करने के बाद उसने स्वामी जी को बताया कि वह उनके पास किसी विशेष काम से आया है। "स्वामी जी, मैने सब कुछ त्याग दिया है,मोह माया के बंधन से छूट गया हूँ परंतु मुझे शांति नहीं मिली। मन सदा भटकता रहता है।


     एक गुरु के पास गया था जिन्होंने एक मंत्र भी दिया था और बताया था कि इसके जाप से अनहदनाद सुनाई देगा और फिर शांति मिलेगी। बड़ी लगन से मंत्र का जाप किया,फिर भी मन शांत नहीं हुआ।


    अब मैं परेशान हूँ।" इतना कहकर उस साधु की आँखे गीली हो गई। "क्या आप सचमुच शान्ति चाहते हैं",विवेकानन्द जी ने पूछा। बड़े उदासीन स्वर में साधु बोला ,इसीलिये तो आपके पास आया हूँ।


     स्वामी जी ने कहा,"अच्छा,मैं तुम्हें शान्ति का सरल मार्ग बताता हूँ। इतना जान लो कि सेवा धर्म बड़ा महान है।घर से निकलो और बाहर जाकर भूखों को भोजन दो,प्यासों को पानी पिलाओ,विद्यारहितों को विद्या दो और दीन,दुर्बल,दुखियों एवं रोगियों की तन,मन और धन से सहायता करो।


     सेवा द्वारा मनुष्य का अंतःकरण जितनी जल्दी निर्मल,शान्त,शुद्ध एवं पवित्र होता है,उतना किसी और काम से नहीं। ऐसा करने से आपको सुख,शान्ति मिलेगी।" साधु एक नए संकल्प के साथ चला गया। उसे समझ आ गयी कि मानव जाति की निः स्वार्थ सेवा से ही मनुष्य को शान्ति प्राप्त हो सकती है।

     

    लौकिक सुखों से परे सच्चा सुख | Hindi Moral Story

    एक गाँव के मंदिर में एक ब्रह्मचारी रहता था। लोभ,मोह से परे अपने आप में मस्त रहना उसका स्वभाव था। कभी-कभी वह यह विचार भी करता था कि इस दुनिया में सर्वाधिक सुखी कौन है? एक दिन एक रईस उस मंदिर में दर्शन हेतु आया।


     उसके मंहगे वस्त्र,आभूषण,नौकर-चाकर आदि देखकर बह्मचारी को लगा कि यह बड़ा सुखी आदमी होना चाहिए। उसने उस रईस से पूछ ही लिया। रईस बोला-मैं कहाँ सुखी हूँ भैया! मेरे विवाह को  ग्यारह वर्ष हो गए,किन्तु आज तक मुझे संतान सुख नहीं मिला।


     मैं तो इसी चिंता में घुलता रहता हूँ कि मेरे बाद मेरी सम्पति का वारिस कौन होगा और कौन मेरे वंश के नाम को आगे बढ़ाएगा? पड़ोस के गांव में एक विद्वान पंडित रहते हैं। मेरी दृष्टि में वे ही सच्चे सुखी हैं।


    ब्रह्मचारी विद्वान पंडित से मिला,तो उसने कहा-मुझे कोई सुख नहीं है बंधु,रात-दिन परिश्रम कर मैंने विद्यार्जन किया,किन्तु उसी विद्या के बल पर मुझे भरपेट भोजन भी नहीं मिलता।


     अमुक गांव में जो नेताजी रहते हैं,वे यशस्वी होने के साथ-साथ लक्ष्मीवान भी है। वे तो सर्वाधिक सुखी होंगे। ब्रह्मचारी उस नेता के पास गया,तो नेताजी बोले-मुझे सुख कैसे मिले? मेरे पास सब कुछ है,किन्तु लोग मेरी बड़ी निंदा करते हैं।


     मैं कुछ अच्छा भी करूँ तो उसमें बुराई खोज लेते हैं। यह मुझे सहन नहीं होता। यहां से चार गांव छोड़कर एक गांव के मंदिर में एक मस्तमौला ब्रह्मचारी रहता है।


     इस दुनिया में उससे सुखी और कोई नहीं हो सकता। ब्रह्मचारी अपना ही वर्णन सुनकर लज्जित हुआ और वापिस मंदिर में लौटकर पहले की तरह सुख से रहने लगा।


     उसे समझ में आ गया कि सच्चा सुख लौकिक सुखों में नहीं है बल्कि वह तो लौकिक चिंताओं से मुक्त अलौकिक की निः स्वार्थ उपासना में बसता है। समस्त भौतिकता से परे आत्मिकता को पा लेना ही सच्चे सुख व आनंद की अनुभूति कराता है।

     

    Hindi Moral Story For Class 8 | संतोष से सुख

    एक सेठजी का आकस्मिक स्वर्गवास हो गया। उनके बाद उनका लड़का मालिक बना। उसने एक दिन अपने पुराने मुनीम जी से पूछा कि मुनीम जी हमारे पास कितना धन है? मुनीम ने सोचा अभी यह लड़का है,इससे क्या कहें,क्या न कहें।


     मुनीम जी ने कहा-"सेठजी,आपके पास इतना धन है कि आपकी तेरह पीढ़ी बैठे-बैठे खा सकती हैं।" इसे सुनकर सेठजी का चेहरा उदास हो गया।


     सोचने लगे कि तेरहवीं पीढ़ी तक का तो इंतजाम है,लेकिन चौदहवीं पीढ़ी क्या खायेगी? सेठजी चिन्तित रहने लगे,जिसके कारण भूख और नींद ही हवा हो गई,तबियत उदास रहने लगी।


     सेठ जी को उदास देखकर मुनीम जी ने पूछा-"सेठ जी! एक उपाय करो। आप एकादशी का व्रत रखा करो और द्वादशी के दिन किसी सन्तोषी ब्राह्मण को सीधा(अन्नदान) दान कर दिया करो। आपकी सब चिंताएं दूर हो जायेंगी।"सेठ जी ने ऐसा ही किया।


     तीन दिन बाद एकादशी थी। सेठ जी ने एकादशी का व्रत किया। दूसरे दिन प्रातः मुनीम जी से बोले-"सीधा अपने हाथ से ही ब्राह्मण को देना चाहिए।" सेठ जी ने एक सीधा लगवाया और मुनीम जी को साथ लेकर ब्राह्मण के दरवाजे पर गये। पंडित जी!सीधा ले लीजिये।


     पण्डित जी ने कहा-ठहरिये,मैं भीतर पण्डितानी से पूछ आऊँ।वह भीतर गए और पंडितानी से पूछा-"आज का क्या प्रबंध है?" ब्राह्मणी ने कहा-'आज का सीधा आ गया है।' पंडित जी बाहर आये और सेठजी से बोले-"सेठजी!आज का सीधा हमारे यहाँ आ गया है,आप इसे किसी दूसरे ब्राह्मण को दे दीजिये।"


     सेठजी बोले-"आज का आ गया है तो क्या हुआ,यह आपको कल काम देगा।"ब्राह्मण देवता ने कहा-"जिसने आज का प्रबंध किया है,वही कल का भी करेगा। हम भविष्य की चिंता नहीं करते।"


     ऐसा सुनते ही सेठजी सोचने लगे,"मुझे तो चौदहवीं पीढ़ी की चिंता है और इस ब्राह्मण को कल की भी चिंता नहीं!" सेठ जी की भीतरी आँखे खुल गई,उनकी चिंता दूर जो गई। भगवान का अनन्त  भक्त भविष्य की चिंता नहीं करता।

     

    आशा से आसमान | Hindi Moral Story For Class 8

    दो राजाओं में युद्ध हुआ।विजयी राजा ने हारे हुए राजा के किले को घेर लिया और उसके सभी विश्वासपात्र अधिकारियों को बंदी बनाकर कारागृह में डाल दिया।उन कैदियों में पराजित राजा का युवा मंत्री और उसकी पत्नी भी थे।


     दोनों को किले के एक विशेष हिस्से में कैद कर रखा गया था। कैदखाने के दरोगा ने उन्हें आकर समझाया कि हमारे राजा की गुलामी स्वीकार कर लो नहीं तो कैद में ही भूखे-प्यासे तड़प-तड़पकर मर जाओगे। किन्तु स्वाभिमानी मंत्री को गुलामी स्वीकार नहीं थी,इसलिए चुप रहा।


     दरोगा चला गया। इन दोनों को जिस भवन में रखा गया था,उसमें सौ दरवाजे थे। सभी दरवाजों पर बड़े-बड़े ताले लगे हुए थे। मंत्री की पत्नी का स्वास्थ्य लगातार गिरता जा रहा था और वह बहुत घबरा गई थी,किन्तु मंत्री शांत था। उसने पत्नी को दिलासा देते हुए कहा-निराश मत हो।


     गहरे अंधकार में भी रोशनी की एक किरण अवश्य होती है।ऐसा कहकर वह एक-एक दरवाजे को धकेलकर देखने लगा। दरवाजा नहीं खुला। लगभग बीस-पच्चीस दरवाजे देखे,किन्तु कोई भी दरवाजा नहीं खुला।


       मंत्री थक गया और उसकी पत्नी की निराशा बढ़ती गई। वह बोली-तुम्हारा दिमाग तो ठीक है? इतने बड़े-बड़े ताले लगे हैं,भला तुम्हारे धक्कों से वे दरवाजे कैसे खुलेंगे? किन्तु मंत्री हताश नहीं हुआ और वह उसी लगन से दरवाजों को धकेलता रहा।


      उसने निन्यानवें दरवाजे धकेले,किन्तु एक भी नहीं खुला। पत्नी ने चिढ़कर उसे बैठा दिया। किन्तु थोड़ी देर बाद वह पुनः खड़ा हुआ और सौवें दरवाजे को धक्का दिया।


      धक्का देते ही उसकी चूलें चरमराई। मंत्री को अनुमान हो गया कि यह दरवाजा खुल सकता है। उसने दोगुने उत्साह से दरवाजे को धक्का देना शुरू किया और थोड़ी देर में वह खुल गया।


      मंत्री ने शांत भाव से जवाब दिया-इसलिए कि जिंदगी में कभी सारे दरवाजे बंद नहीं हुआ करते। उस दरवाजे से निकलकर मंत्री और उसकी पत्नी ने कैद से आजादी पा ली।


    जो धैर्य के साथ आगे बढ़ता जाता है,जीत उसकी ही होती है।

     

    Hindi Moral Story For Class 8 | सबसे बड़ा धन

    एक भिखारी भूख प्यास से त्रस्त होकर आत्महत्या की योजना बना रहा था,तभी वहां से एक नेत्रहीन महात्मा गुजरे।भिखारी ने उन्हें अपने मन की व्यथा सुनाई और कहा,'मैं अपनी गरीबी से तंग आकर आत्महत्या करना चाहता हूँ।


      उसकी बात सुन महात्मा हँसे और बोले,'ठीक है। आत्महत्या करो, लेकिन पहले अपनी एक आँख मुझे दे दो। मैं तुम्हें एक हजार अशर्फियाँ दूंगा।' भिखारी चौंका। उसने कहा,'आप कैसी बात करते हैं। मैं आँख कैसे दे सकता हूँ।'


      महात्मा बोले,'आँख न सही,एक हाथ ही दे दो,मैं तुम्हें दस हजार अशर्फियाँ दूंगा।' भिखारी असमंजस में पड़ गया। महात्मा मुस्कुराते हुए बोले,'संसार में सबसे बड़ा धन निरोगी काया है।


      तुम्हारे हाथ-पाँव ठीक हैं,शरीर स्वस्थ है, तुमसे बड़ा धनी और कौन हो सकता है। तुमसे गरीब तो मैं हूँ कि मेरी आँखे नहीं है। मगर मैं तो कभी आत्महत्या के बारे में नहीं सोचता।


      भिखारी ने उनसे क्षमा माँगी और संकल्प किया कि वह कोई काम करके जीवन यापन करेगा।

     

    दोष नहीं, अच्छाइयां खोजें | Hindi Moral Story For Class 8

      किसी गांव में एक किसान को बहुत दूर से पीने के लिए पानी भरकर लाना पड़ता था। उसके पास दो बाल्टियां थीं जिन्हें वह एक डंडे के दोनों सिरों पर बांधकर उनमें तालाब से पानी भरकर लाता था।


      उन दोनों बाल्टियों में से एक के तले में एक छोटा सा छेद था जबकि दूसरी बाल्टी बहुत अच्छी हालत में थी। तालाब से घर तक के रास्ते में  छेद वाली बाल्टी से पानी रिसता रहता था और घर पहुँचते -पहुँचते उसमें आधा पानी ही बचता था।


      बहुत लंबे अरसे तक ऐसा रोज होता रहा और किसान सिर्फ डेढ़ बाल्टी पानी लेकर ही घर आता रहा। अच्छी बाल्टी को रोज-रोज यह देख खुद पर घमंड हो गया।


     छेद वाली बाल्टी अपने जीवन से पूरी तरह निराश हो चुकी थी। एक दिन रास्ते में उसने किसान से कहा,'मैं अच्छी बाल्टी नहीं हूँ। मेरे तले में छेद है।


      किसान ने छेद वाली बाल्टी से कहा,'क्या तुम देखती हो कि पगडण्डी के जिस ओर तुम चलती हो उस ओर हरियाली है और फूल खिलते है लेकिन दूसरी ओर नहीं।


      ऐसा इसलिए है क्योंकि मुझे हमेशा से इसका पता था और मैं तुम्हारे तरफ की पगडंडी पर फूलों के बीज छिड़कता रहता था जिन्हें तुमसे रिसने वाले पानी से सिंचाई लायक नमी मिल जाती थी।


      यदि तुममें वह बात नहीं होती,जिसे तुम अपना दोष समझती हो तो हमारे आसपास इतनी सुन्दरता नहीं होती।'


      कभी-कभी ऐसे दोषों और कमियों से भी हमारे जीवन को सुंदरता और पारितोषिक देने वाले अवसर मिलते है। दूसरों में दोष ढूंढने की बजाय अच्छाइयां खोजें।

     

     Hindi Moral Story For Class 8 | सच्ची प्रार्थना

    एक पुजारी थे। लोग उन्हें अत्यंत श्रद्धा एवं भक्ति- भाव से देखते थे। पुजारी प्रतिदिन सुबह मंदिर जाते और दिन भर वहीं यानी मंदिर में रहते। सुबह से ही लोग उनके पास प्रार्थना के लिए आने लगते।


      जब कुछ लोग इकट्ठे हो जाते , तब मंदिर में सामूहिक प्रार्थना होती। जब प्रार्थना संपन्न हो जाती, तब पुजारी लोगों को अपना उपदेश देते। उसी नगर एक गाड़ीवान था। वह सुबह से शाम तक अपने काम में लगा रहता।


      इसी से उसकी रोजी -रोटी चलती। यह सोच कर उसके मन में बहुत दुख होता कि मैँ हमेशा अपना पेट पालने के लिए काम धंधे में लगा रहता हूँ, जबकि लोग मंदिर में जाते है और प्रार्थना करते हैं।


      मुझ जैसा पापी शायद ही कोई इस संसार में हो। मारे आत्मग्लानि के गाड़ीवान ने पुजारी के पास पहुंचकर अपना दुख जताया। 'पुजारी जी!


      मैं आपसे यह पूछने आया हूँ कि क्या मैं अपना यह काम छोड़ कर नियमित मंदिर मेँ प्रार्थना के लिए आना आरंभ कर दूँ।' पुजारी ने गाड़ीवान की बात गंभीरता से सुनी।


      उन्होंने गाड़ीवान से पूछा,'अच्छा, तुम यह बताओ कि तुम गाड़ी में सुबह से शाम तक लोगों को एक गांव से दूसरे गांव तक पहुंचाते हो।


     क्या कभी ऐसे अवसर आए हैं कि तुम अपनी गाड़ी में बूढ़े,अपाहिजों और बच्चों को मुफ्त में एक गांव से दूसरे गांव तक ले गए हो?गाड़ीवान ने तुरंत ही उत्तर दिया,'हां पुजारी जी!ऐसे अनेक अवसर आते हैं।


      यहां तक कि जब मुझे यह लगता है कि राहगीर पैदल चल पाने में असमर्थ है, तब मैं उसे अपनी गाड़ी में बैठा लेता हूँ।' पुजारी गाड़ीवान की यह बात सुनकर अत्यंत उत्साहित हुए।


      उन्होंने गाड़ीवान से कहा,'तब तुम अपना पेशा बिल्कुल मत छोड़ो। थके हुए बूढ़ों,अपाहिजों, रोगियों और बच्चों को कष्ट से राहत देना ही ईश्वर की सच्ची प्रार्थना है।


      सच तो यह है कि सच्ची प्रार्थना तो तुम ही कर रहे हो।'यह सुनकर गाड़ीवान अभिभूत हो उठा।

     

    Hindi Moral Story For Class 8 | सेवक और मालकिन

    श्रावस्ती में विदेहिका नाम की एक धनी स्त्री रहती थी। वह अपने शांत और सौम्य व्यवहार के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध थी।वेदेहिका के घर में काली नाम का एक नौकर था।


     काली अपने काम और आचरण में बहुत कुशल और वफादार था। एक दिन काली ने सोचा,'सभी लोग कहते है कि मेरी मालकिन बहुत शांत स्वभाव वाली है और उसे कभी क्रोध नहीं आता,यह कैसे संभव है!


      शायद मैं अपने काम में इतना अच्छा हूँ इसलिए वह मुझ पर कभी क्रोधित नहीं हुई। मुझे यह पता लगाना होगा कि वह क्रोधित हो सकती है या नहीं।' अगले दिन काली काम पर कुछ देरी से आया।


      विदेहिका ने जब उससे विलम्ब से आने के बारे में पूछा तो वह बोला,'कोई खास बात नहीं।'विदेहिका ने कुछ कहा तो नहीं,पर उसे काली का उत्तर अच्छा नहीं लगा। दूसरे दिन काली थोड़ा और देर से आया।


      विदेहिका ने फिर उससे देरी से आने का कारण पूछा। काली ने फिर से जवाब दिया,'कोई खास बात नहीं।'यह सुनकर विदेहिका बहुत नाराज हो गई, लेकिन वह चुप रही।


      तीसरे दिन भी यही हुआ तो मारे क्रोध के विदेहिका ने काली के सिर पर डंडा दे मारा। काली के सिर से खून बहने लगा और वह घर के बाहर भागा।


      यह बात आग की तरह फैल गई और विदेहिका की ख्याति मिट्टी में मिल गई। कठिन परिस्थितियों में भी जो दृढ़ रहता है,वही अपनी बुराइयों पर पार पा सकता है।

     

    Hindi Moral Story | वह अड़ा, यह झुका

    नदी के किनारे एक विशाल शमी का वृक्ष था। एक बैंत का पेड़ भी था ,जिसकी लताऐं फैली हुई थी। एक दिन नदी में भयंकर बाढ़ आयी।प्रवाह प्रचंड था।शमी सोचता था ,'मेरी जड़े तो गहरी और मजबूत है।


     मेरा क्या नुकसान होगा ।'इसी बीच लहरों ने जड़ों के नीचे की मिट्टी काटनी शुरु कर दी । हर लहर मिट्टी खिसका देती और बहा ले जाती।देखते- देखते वृक्ष उखड़ गया।


     देखने वालों ने अगले दिन पाया कि वृक्ष उखड़ा पड़ा है।उस की जड़ों ने हाथ खड़े कर दिए ,और वह सब शांत हो चुकी नदी के किनारे असहाय पड़ा था।


      बांस का पेड़ भी उसी वक्त बाढ़ से जूझा जब बाढ़ का प्रभाव तेज हुआ तो वह झुक गया और मिट्टी की सतह पर लेट गया।गरजता पानी उसके ऊपर से गुजर गया ।


     बाढ़ उतरने पर उसने पाया कि वह तो सुरक्षित है,पर उसका पड़ोसी उखड़ा पड़ा है। देखने वाले चर्चा कर रहे थे कि अहंकारी ,अक्खड़ और अदूरदर्शी जो समय की गति को नहीँ पहचान पाते,इसी तरह समय के प्रवाह से उखड़ जाते है।


     जो भी विनम्र है, झुकते है,अनावश्यक टकराते नहीँ ,तालमेल बैठा लेते है, वे अपनी सज्जनता का सुफल पाकर रहते है।


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