Top 26 Hindi Moral Story With Picture हिंदी में नैतिक कहानी 2020 | Hindi Moral story

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Hindi Moral Story With Picture


यहां मैं हिंदी में नैतिक कहानी के लिए शीर्ष कहानी साझा कर रहा हूं जो बहुत मूल्यवान हैं और अपने को जीवन के सबक सिखाते हैं, जो आपके बच्चों को लोगों और दुनिया को समझने में मदद करते हैं इसलिए मैं आपके साथ हिंदी में नैतिक के लिए कहानी साझा कर रहा हूं।


    Hindi Moral story एक बावर्ची ने उंड़ेल दी बादशाह पर सब्जी 


    एक बार बादशाह नौशेरवां भोजन कर रहे थे। अचानक खाना परोस रहे बावर्ची के हाथ से थोड़ी सी सब्जी बादशाह के कपड़ों पर छलक गई। बादशाह की त्यौरियां चढ़ गईं। 


    जब बावर्ची ने यह देखा तो वह थोड़ा घबराया, लेकिन कुछ सोचकर उसने प्याले की बची सारी सब्जी भी बादशाह के कपड़ों पर उड़ेल दी। अब तो बादशाह के क्रोध की सीमा न रही। उसने बावर्ची से पूछा, 'तुमने ऐसा करने का दुस्साहस कैसे किया?' 

    Hindi Moral story एक बावर्ची ने उंड़ेल दी बादशाह पर सब्जी


    बावर्ची ने अत्यंत शांत भाव से उत्तर दिया, 'जहांपना ! पहले आपका गुस्सा देखकर मैनें समझ लिया था कि अब जान नहीं बचेगी। लेकिन फिर सोचा कि लोग कहेंगे की बादशाह ने थोड़ी सी गलती पर एक बेगुनाह को मौत की सजा दी। ऐसे में आपकी बदनामी होती होती। तब मैनें सोचा कि सारी सब्जी ही उड़ेल दूं। ताकि दुनिया आपको बदनाम न करे। और मुझे ही अपराधी समझे।' 


    नौशेरवां को उसके जबाव में इस्लाम के गंभीर संदेश के दर्शन हुए और पता चला कि सेवक भाव कितना कठिन है। इस तरह बादशाह ने बावर्ची को जीवनदान दे दिया।


    Hindi Moral story दुनिया में आए हो अगर तो मरना ही होगा 


    कृशा गौतमी श्रावस्ती के निर्धन परिवार में जन्मी थी। जितनी वह निर्धन थी, उतनी ही सुंदर। सुंदरता के कारण उसका विवाह एक धनी व्यक्ति से उसका विवाह हो गया। लेकिन वहां उसका हमेशा अपमान होता था। जब पुत्र हुआ तो सम्मान होने लगा। 


    समय बदला और उसके पुत्र की अचानक ही मृत्यु हो गई। गौतमी को इतना दुख हुआ कि वह विक्षिप्त हो गई। वह शव को छाती से लगा कर इधर-उधर भटकने लगी। अंत में तथागत के पास पहुंची और पुत्र को जीवित करने का हठ करने लगी। 


    तथागत ने उससे कहा, तुम उस घर से सरसों के दाने ले आओ, जहां कभी किसी की मृत्यु नहीं हुई हो। गौतमी प्रत्येक घर में गई लेकिन कहीं ऐसा घर नहीं मिला जहां कभी मृत्यु नहीं हुई हो। वह समझ गई इस संसार में जो आया है उसे मरना ही होगा। 


    इस तरह तथागत ने गौतमी को दिव्य ज्ञान देते हुए उसकी समस्या का निराकरण किया।


    Hindi Moral story ज़िंदगी में सफल होने के लिए बहुत जरूरी है छटपटाहट 


    महान दार्शनिक सुकरात से एक बार एक युवक मिला। उसने सफलता पाने का उपाय पूछा। सुकरात ने उसे अगले दिन आने के लिए कहा। अगले दिन युवक ने फिर से वही सवाल पूछा तो सुकरात ने उसे फिर से अगले दिन आने को कहा। 


    कई महीने बीत जाने के बाद भी लड़का रोज आता और सुकरात उसे अगले दिन आने को टाल देते। एक दिन लड़के ने कहा कि, 'मैं रोज इतनी दूर से यहां आने से अच्छा मै आपके आंगन में ही बैठ जाता हूं। सुबह, दोपहर,शाम, रात, दिन में बार-बार मुझे देखकर आपका दिल जरूर पिघलेगा।' 

    Hindi Moral story


    सुकरात ने लड़के के तरफ ध्यान नही दिया परंतु वह मन ही मन खुश जरूर थे। रात में सुकरात ने लड़के से अगले दिन सुबह सफलता का रहस्य बताने का वादा किया। अगली सुबह सुकरात लड़के को लेकर नदी किनारे गए। 


    सुकरात ने लड़को को नदी किनारे लाकर कहा कि तुम नदी में डुबकी लगाओं फिर मै तुम्हें सफलता पाने का तरीका बताता हूं। लड़के ने जैसे ही डुबकी लगाया सुकरात ने उसका सिर पकडकर पानी में दबा दिया। 


    लड़का छटपटाने लगा। सुकरात ने उसे फिर से डुबकी लगाने के लिए कहा जैसे ही लड़का अंदर गया सुकरात ने फिर उसका सिर दबा दिया। एक बार सुकरात उसे निकलने नही दे रहा था। लड़का बहुत जोर से छटपटाने लगा। 


    सुकरात के छोड़ते ही लड़का बाहर निकला । सुकरात ने कहा तुम सफलता के लिए इसी तरह छटपटाओगे जिस तरह हवा के लिए छटपटा रहे थे, मानो उसके बिना मर जाओगे, तो सफलता हर हाल में तुम्हारे कदमों में होगी।


    Hindi Moral story छोटी बुराई, बड़ी बुराई के लिए रास्ता खोलती है 


    नौशेरवां ईरान का बड़ी ही न्यायप्रिय बादशाह था। छोटी सी छोटी चीजों में भी न्याय की तुला उसके हाथ में रहती थी। सबसे अधिक ध्यान वह अपने आचरण पर रखता था। 


    एक बार बादशाह जंगल की सैर करने गया। उसके साथ कुछ नौकर चाकर भी थे। घूमते-घूमते वह शहर से काफी दूर निकल आए। इस बीच बादशाह को भूख लगी। बादशाह ने सेवकों से कहा कि यहीं भोजन बनाने की व्यवस्था की जाए। खाना वहीं तैयार किया गया। बादशाह जब खाना खाने बैठा तो उसे सब्जी में नमक कम लगा। उसने अपने सेवकों से कहा कि जाओ और गांव से नमक लेकर आओ। 


    दो कदम पर गांव था। एक नौकर जाने को हुआ तो बादशाह ने कहा, 'देखो जितना नमक लाओ, उतना पैसा दे आना।' 


    नौकर ने यह सुना तो बादशाह की ओर देखा। बोला, 'सरकार नमक जैसी चीज के लिए कौन पैसा लेगा आप उसकी फिक्र क्यों करते हैं?' 


    बादशाह ने कहा, 'नहीं तुम उसे पैसे देकर आना।' नौकर बड़े आदर से बोला, 'हुजूर, जो आपको नमक देगा, उसके लिए कोई फर्क नहीं पड़ेगा, उल्टे खुशी होगी कि वह अपने बादशाह की सेवा में अपना अमूल्य योगदान दे रहा है।' 


    तब बादशाह बोला, 'यह मत भूलो की छोटी चीजों से ही बड़ी चीजें बनती हैं। छोटी बुराई, बड़ी बुराई के लिए रास्ता खोलती है। अगर में किसी पेड़े से एक फल तोड़ता हूं। तो मेरे सिपाही उस पेड़ पर एक भी फल नहीं छोड़ेंगे। मुमकिन है, ईंधन के लिए पेड़ को ही काटकर ले जाएं। ठीक है एक फल की कोई कीमत नहीं होती, लेकिन बादशाह की जरा सी बात से कितना बड़ा अन्याय हो सकता है। जो हुकूमत की गद्दी पर बैठता है, उसे हर घड़ी चौकन्ना रहना पड़ता है।'


    Hindi Moral story एक राजा जो था कंगाल 


    एक महात्मा रास्ते से कहीं जा रहे थे। वह फटे हुए मैले कपड़े पहने हुए थे। सामने से आ रहे राजा के सिपाही बोले, रास्ते से हट जाओ। राजा साहब आ रहे हैं। 


    इतने में राजा साहब आ गए। महात्मा आगे बढ़े और राजा से पूछ बैठे, राजा जिसे चाहे अपने देश से निकाल सकता है, ऐसा है क्या ? तब तो बहुत अच्छा है... महात्मा ने आगे कहा कि, मुझे रात को मच्छर काटते हैं, सांप का भय सताता है। राजाजी आप हुक्म दो कि हमारे देश में सांप नहीं रहें। 


    तब राजा ने कहा कि, हम इनको नहीं निकाल सकते, आप हमारे महल में रह सकते हैं। राजा के आमंत्रण पर महात्मा जी एक दिन महल गए। देखा कि महल के दरवाजे पर बंदूकधारी पहरेदार तैनात हैं। 

    Hindi Moral story एक राजा जो था कंगाल


    वह मन ही मन सोचने लगे कि यह महल है या तहखाना। तब राजा ने महात्मा को झरोखे से देख लिया। महात्मा जी का स्वागत सत्कार किया गया। 


    शाम के समय राजा, महात्माजी के नजदीक के कमरे में खड़े होकर ईश्वर से प्रार्थना करने लगा कि, हे भगवान, मुझे धन दो, आयु दो, राज्य बढ़ाओ। 


    महात्मा ने सुन लिया। महात्मा बोले, हमने तो समझा था, आप राजा हो, धनी होगे ही। तुम तो कंगाल निकले, ऐसे में हम तेरे पास रहकर क्या करेंगे। जिससे तुम मांगते हो, जरूरत हुई तो हम भी उसी से मांग लेंगे। 


    Hindi Moral story इंसानियत की कद्र करना इनसे सीखें 


    एक बार एक नवाब की राजधानी में एक फकीर आया। फकीर की कीर्ति सुनकर पूरे नवाबी ठाठ के साथ भेंट के थाल लिए हुए वह फकीर के पास पहुंचा। तब फकीर कुछ लोगों से बातचीत कर रहे थे। उन्होंने नवाब को बैठने का निर्देश दिया। जब नवाब का नंबर आया तो फकीर ने नवाब की ओर बढ़ा दिया। 


    भेंट के हीरे-जवाहरातों को भरे थालों को फकीर ने छुआ तक नहीं, हां बदले में एक सूखी रोटी नवाब को दी, कहां इसे खा लो। रोटी सख्त थी, नवाब से चबायी नहीं गई। तब फकीर ने कहा जैसे आपकी दी हुई वस्तु मेरे काम की नहीं उसी तरह मेरी दी हुई वस्तु आपके काम की नहीं। 


    हमें वही लेना चाहिए जो हमारे काम का हो। अपने काम का श्रेय भी नहीं लेना चाहिए। नवाब फकीर की इन बातों को सुनकर काफी प्रभावित हुआ। नवाब जब जाने के लिए हुआ तो फकीर भी दरवाजे तक उसे छोड़ने आया। नवाब ने पूछा, मैं जब आया था तब आपने देखा तक नहीं था, अब छोड़ने आ रहे हैं? 


    फकीर बोला, बेटा जब तुम आए थे तब तुम्हारे साथ अहंकार था। अब तो चोला तुमने उतार दिया है तुम इंसान बन गए हो। हम इंसानियत का आदर करते हैं। नवाब नतमस्तक हो गया।


    Hindi Moral story With Picture दर्द नहीं खुशियां बांटो 


    एक बार तैलंगस्वामी को तंग करने के इरादे से एक व्यक्ति ने दूध के बदले चूना घोलकर एक पात्र में रख दिया। स्वामीजी ने पात्र की ओर देखा और घोल को चुपचाप पी लिया। वह व्यक्ति सोचने लगा कि शीग्र ही चूना असर करेगा। 


    मगर यह देख वह हैरान हो गया कि उन पर तो कोई असर ही नहीं हुआ, बल्कि उसका ही जी घबराने लगा और वह दर्द से तड़पने लगा। वह समझ गया कि यह स्वामीजी को तंग करने का ही परिणाम है। वह उनके चरणों में गिरकर माफी मांगने लगा। 


    स्वामीजी ने पास ही रखी स्लेट पर चूने की खड़िया से लिखा, चूने का पानी मैंने पिया और इसका परिणाम तुझे भोगना पड़ा। इसका एक ही कारण है वह यह कि हम दोनों के शरीर में आत्मा का वास है। यदि दूसरे की आत्मा को कष्ट दिया जाए तो वह कष्ट स्वयं को भी भोगना पड़ता है। इसलिए दूसरों को कष्ट देने की कोशिश भी नहीं करनी चाहिए। 


    इस तरह स्वामीजी ने उस व्यक्ति के सिर पर हाथ रखा और उसका दर्द चला गया। उस व्यक्ति ने स्वामीजी से मांफी मांगी और कहा कि अब वह किसी को भी तंग नहीं करेगा। 


    Hindi Moral story सत्य का साथ कभी न छोड़ें 


    स्वामी विवेकानंद प्रारंभ से ही एक मेधावी छात्र थे और सभी लोग उनके व्यक्तित्व और वाणी से प्रभावित रहते थे। जब वो अपने साथी छात्रों से कुछ बताते तो सब मंत्रमुग्ध हो कर उन्हें सुनते थे। 


    एक दिन कक्षा में वो कुछ मित्रों को कहानी सुना रहे थे, सभी उनकी बातें सुनने में इतने मग्न थे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि कब मास्टर जी कक्षा में आए और पढ़ाना शुरू कर दिया। 


    मास्टर जी ने अभी पढऩा शुरू ही किया था कि उन्हें कुछ फुसफुसाहट सुनाई दी। कौन बात कर रहा है? मास्टर जी ने तेज आवाज़ में पूछा। सभी छात्रों ने स्वामी जी और उनके साथ बैठे छात्रों की तरफ इशारा कर दिया। मास्टर जी क्रोधित हो गए। 


    उन्होंने तुरंत उन छात्रों को बुलाया और पाठ से संबधित प्रश्न पूछने लगे। जब कोई भी उत्तर नहीं दे पाया। तब अंत में मास्टर जी ने स्वामी जी से भी वही प्रश्न किया, स्वामी जी तो मानो सब कुछ पहले से ही जानते हों , उन्होंने आसानी से उस प्रश्न का उत्तर दे दिया। 


    यह देख मास्टर जी को यकीन हो गया कि स्वामी जी पाठ पर ध्यान दे रहे थे और बाकी छात्र बात-चीत में लगे हुए थे। फिर क्या था। 


    उन्होंने स्वामी जी को छोड़ सभी को ब्रेंच पर खड़े होने की सजा दे दी। सभी छात्र एक-एक कर ब्रेंच पर खड़े होने लगे, स्वामी जी ने भी यही किया। 


    मास्टर जी बोले - नरेन्द्र तुम बैठ जाओ!नहीं सर, मुझे भी खड़ा होना होगा क्योंकि वो मैं ही था जो इन छात्रों से बात कर रहा था। स्वामी जी ने आग्रह किया। सभी उनकी सच बोलने की हिम्मत देख बहुत प्रभावित हुए। 


    'मिट्टी के मोल रेत' Hindi Moral story With Picture 


    एक बंजारा था। वह बैलों पर मिट्टी ( मुल्तानी मिट्टी) लादकर दिल्ली की तरफ आ रहा था। रास्ते में कई गांवो से गुजरते समय उसकी बहुत-सी मिट्टी बिक गई। बैलों की पीठ पर लदे बोरे आधे तो खाली हो गए और आधे भरे रह गए। अब वे बैलों की पीठ पर कैसे टिकें? क्योंकि भार एक तरफ ज्यादा हो गया था। 


    नौकरों ने पूछा कि क्या करें ? बंजारा बोला-'अरे ! सोचते क्या हो, बोरों के एक तरफ रेत (बालू) भर लो। यह राजस्थानी जमीन है, यहां रेत बहुत है।' नौकरों ने वैसा ही किया। बैलों की पीठ पर एक तरफ आधे बोरे में मिट्टी हो गई और दूसरी तरफ आधे बोरे में रेत हो गई। 


    दिल्ली से एक सज्जन उधर आ रहे थे। उन्होंने बैलों पर लदे बोरों में से एक तरफ रेत गिरते हुए देखी तो बोले कि बोरों में एक तरफ रेत क्यों भरी है ? नौकरों ने कहा-'सन्तुलन करने के लिये।' वे सज्जन बोले-'अरे यह तुम क्या मूर्खता करते हो ? 


    तुम्हारा मालिक और तुम एक से ही हो। बैलों पर मुफ्त में ही भार ढोकर उनको मार रहे हो मिट्टी के आधे-आधे दो बोरों को एक ही जगह बांध दो तो कम-से-कम आधे बैल तो बिना भार के चलेंगे।' 


    नौकरों ने कहा कि आपकी बात तो ठीक जंचती है, पर हम वही करेंगे, जो हमारा मालिक कहेगा। आप जाकर हमारे मालिक से यह बात कहो और उनसे हमें आदेश दिलवाओ। वह राहगीर (बंजारे) से मिला और उससे बात कही। बंजारे ने पूछा कि आप कहां के हैं ? कहां जा रहे हैं ? 


    उसने कहा कि मैं भिवानी का रहने वाला हूं रुपए कमाने के लिए दिल्ली गया था। कुछ दिन वहां रहा, फिर बीमार हो गया। जो थोड़े रुपए कमाए थे, वे खर्च हो गये। व्यापार में घाटा लग गया। पास में कुछ रहा नहीं तो विचार किया कि घर चलना चाहिये। 


    उसकी बात सुनकर बंजारा नौकरों से बोला कि इनकी सलाह मत लो। अपने जैसे चलते हैं, वैसे ही चलो। इनकी बुद्धि तो अच्छी दिखती है, पर उसका नतीजा ठीक नहीं निकलता नहीं तो ये अबतक धनवान हो जाते। हमारी बुद्धि भले ही ठीक न दिखे, पर उसका नतीजा ठीक होता है। मैंने कभी अपने काम में �


    ईमानदारी और सच्चाई की कीमत Hindi Moral story 


    सऊदी अरब में बुखारी नामक एक विद्वान रहते थे। वह अपनी ईमानदारी के लिए मशहूर थे। एक बार वह समुद्री जहाज से लंबी यात्रा पर निकले। 


    उन्होंने सफर में खर्च के लिए एक हजार दीनार रख लिए। यात्रा के दौरान बुखारी की पहचान दूसरे यात्रियों से हुई। बुखारी उन्हें ज्ञान की बातें बताते गए। 


    एक यात्री से उनकी नजदीकियां कुछ ज्यादा बढ़ गईं। एक दिन बातों-बातों में बुखारी ने उसे दीनार की पोटली दिखा दी। उस यात्री को लालच आ गया। 


    उसने उनकी पोटली हथियाने की योजना बनाई। एक सुबह उसने जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया, 'हाय मैं मार गया। मेरा एक हजार दीनार चोरी हो गया।' वह रोने लगा। 


    जहाज के कर्मचारियों ने कहा, 'तुम घबराते क्यों हो। जिसने चोरी की होगी, वह यहीं होगा। हम एक-एक की तलाशी लेते हैं। वह पकड़ा जाएगा।' 


    यात्रियों की तलाशी शुरू हुई। जब बुखारी की बारी आई तो जहाज के कर्मचारियों और यात्रियों ने उनसे कहा, 'आपकी क्या तलाशी ली जाए। आप पर तो शक करना ही गुनाह है।' 


    यह सुन कर बुखारी बोले, 'नहीं, जिसके दीनार चोरी हुए है उसके दिल में शक बना रहेगा। इसलिए मेरी भी तलाशी भी जाए।' बुखारी की तलाशी ली गई। उनके पास से कुछ नहीं मिला। 


    दो दिनों के बाद उसी यात्री ने उदास मन से बुखारी से पूछा, 'आपके पास तो एक हजार दीनार थे, वे कहां गए?' बुखारी ने मुस्करा कर कहा, 'उन्हें मैंने समुद्र में फेंक दिया। तुम जानना चाहते हो क्यों? 


    क्योंकि मैंने जीवन में दो ही दौलत कमाई थीं-एक ईमानदारी और दूसरा लोगों का विश्वास। अगर मेरे पास से दीनार बरामद होते और मैं लोगों से कहता कि ये मेरे हैं तो लोग यकीन भी कर लेते लेकिन फिर भी मेरी ईमानदारी और सच्चाई पर लोगों का शक बना रहता। 


    मैं दौलत तो गंवा सकता हूं लेकिन ईमानदारी और सच्चाई को खोना नहीं चाहता।' उस यात्री ने बुखारी से माफी मांगी। 


    Hindi Moral story दो दोस्तों की अनसुनी कहानी 


    एक बार दो मित्र साथ-साथ एक रेगिस्तान में चले जा रहे थे। रास्ते में दोनों में कुछ कहासुनी हो गई। बहसबाजी में बात इतनी बढ़ गई की उनमे से एक मित्र ने दूसरे के गाल पर जोर से तमाचा मार दिया। 


    जिस मित्र को तमाचा पड़ा उसे दुःख तो बहुत हुआ किंतु उसने कुछ नहीं कहा वो बस झुका और उसने वहां पड़े बालू पर लिख दिया... 


    'आज मेरे सबसे निकटतम मित्र ने मुझे तमाचा मारा' 


    दोनों मित्र आगे चलते रहे और उन्हें एक छोटा सा पानी का तालाब दिखा और उन दोनों ने पानी में उतर कर नहाने का निर्णय कर लिया। जिस मित्र को तमाचा पड़ा था वह दलदल में फंस गया और डूबने लगा किंतु दूसरे मित्र ने उसे बचा लिया। जब वह बच गया तो बाहर आकर उसने एक पत्थर पर लिखा... 


    'आज मेरे निकटतम मित्र ने मेरी जान बचाई' 


    जिस मित्र ने उसे तमाचा मारा था और फिर उसकी जान बचाई थी वह काफी सोच में पड़ा रहा और जब उससे रहा न गया तो उसने पूछा 


    'जब मैंने तुम्हे मारा था तो तुमने बालू में लिखा और जब मैंने तुम्हारी जान बचाई तो तुमने पत्थर पर लिखा.ऐसा क्यों?' 


    इस पर दूसरे मित्र ने उत्तर दिया, 'जब कोई हमारा दिल दुखाए तो हमें उस अनुभव के बारे में लिख लेना चाहिए क्योंकि उस चीज को भुला देना ही अच्छा है। 


    क्षमा रुपी वायु शीघ्र ही उसे मिटा देगी किंतु जब कोई हमारे साथ कुछ अच्छा करे हम पर उपकार करे तो हमे उस अनुभव को पत्थर पर लिख देना चाहिए जिससे कि कोई भी जल्दी उसको मिटा न सके'।


    Hindi Moral story समस्याओं से भागें नहीं उनका सामना करें 


    कौशाम्बी नरेश की महारानी भगवान बुद्ध से घृणा करती थी। एक बार जब भगवान बुद्ध कौशाम्बी आए तो महारानी ने उन्हें परेशान और अपमानित करने के लिए कुछ विरोधियों को उनके पीछे लगा दिया। 


    गौतम बुद्ध के शिष्य आनंद उनके साथ हमेशा रहते थे। जोकि गौतम बुद्ध के प्रति इस खराब व्यवहार देख दुःखी हो गए। परेशान होकर आनंद ने भगवान बुद्ध से कहा, 'भगवान, ये लोग हमारा अपमान करते हैं। क्यों न इस शहर को छोड़कर कहीं और चल दें?' 


    भगवान बुद्ध ने आनंद से प्रश्न किया, 'कहां जाएं?' आनंद ने कहा, 'किसी दूसरे शहर जहां इस तरह के लोग न हों। तब गौतम बुद्ध बोले, 'अगर वहां भी लोगों ने ऐसा अपमानजनक व्यवहार किया तो?' शिष्य आनंद बोला, 'तो फिर वहां से भी किसी दूसरे शहर की ओर चलेंगे और फिर वहां से भी किसी दूसरे शहर।' 


    तथागत ने गंभीर होकर कहा, 'नहीं आनंद, ऐसा सोचना ठीक नहीं है। जहां कोई मुश्किल पैदा हो, कठिनाईयां आएं, वहीं डटकर उनका मुकाबला करना चाहिए। वहीं उनका समाधान किया जाना चाहिए। जब वे हट जाएं तभी उस स्थान को छोड़ना चाहिए।' 


    ध्यान रखो मुश्किलों को वहीं छोड़कर आगे बढ़ना, पलायन है, किसी समस्या का हल नहीं। 


    Hindi Moral story हतोत्साहित नहीं प्रोत्साहित करें 


    एक दिन एक किसान का गधा कुएं में गिर गया। वह गधा घंटों जोर-जोर से रेंकता (गधे के बोलने की आवाज) रहा से और किसान सुनता रहा और विचार करता रहा कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं। 


    आखिर उसने निर्णय लिया कि गधा काफी बूढा हो चूका था, उसे बचाने से कोई लाभ होने वाला नहीं था इसलिए उसे कुएं में ही दफना देना चाहिए। 


    किसान ने अपने सभी पड़ोसियों को मदद के लिए बुलाया। सभी ने एक-एक फावड़ा पकड़ा और कुएं में मिट्टी डालनी शुरू कर दी। जैसे ही गधे कि समझ में आया कि यह क्या हो रहा है, वह और जोर से चीख कर रोने लगा। और फिर, अचानक वह आश्चर्यजनक रुप से शांत हो गया। 


    सब लोग चुपचाप कुएं में मिट्टी डालते रहे। तभी किसान ने कुएं में झांका तो वह हैरान रह गया। अपनी पीठ पर पड़ने वाले हर फावड़े की मिट्टी के साथ वह गधा एक आश्चर्यजनक हरकत कर रहा था। वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को नीचे गिरा देता था और फिर एक कदम बढ़ाकर उस पर चढ़ जाता था। 


    जैसे-जैसे किसान तथा उसके पड़ोसी उस पर फावड़ों से मिट्टी गिराते वैसे वह हिल कर उस मिट्टी को गिरा देता और एस सीढी ऊपर चढ़ आता । जल्दी ही सबको आश्चर्यचकित करते हुए वह गधा कुएं के किनारे पर पहुंच गया और फिर कूदकर बाहर भाग गया। 


    Hindi Moral story कला का ज्ञान और फिर अभिमान 


    एक युवा ब्रह्यचारी ने दुनिया के कई देशों में जाकर अनेक कलाएं सीखीं। एक देश में उसने धनुष बाण बनाने और चलाने की कला सीखी और कुछ दिनों के बाद वह दूसरे देश की यात्रा पर गया। 


    वहां उसने जहाज बनाने की कला सीखी क्योंकि वहां जहाज बनाए जाते थे। फिर वह किसी तीसरे देश में गया और कई ऐसे लोगों के संपर्क में आया, जो घर बनाने का काम करते थे। 


    इस प्रकार वह सोलह देशों में गया और कई कलाओं को अर्जित करके लौटा। अपने घर वापस आकर वह अहंकार में भरकर लोगों से पूछा-'इस संपूर्ण पृथ्वी पर मुझ जैसा कोई गुणी व्यक्ति है ?' 


    लोग हैरत से उसे देखते। धीरे-धीरे यह बात भगवान बुद्ध तक भी पहुंची। बुद्ध उसे जानते थे। वह उसकी प्रतिभा से भी परिचित थे। वह इस बात से चिंतित हो गए कि कहीं उसका अभिमान उसका नाश न कर दे। एक दिन वे एक भिखारी का रूप धरकर हाथ में भिक्षापात्र लिए उसके सामने गए। 


    ब्रह्यचारी ने बड़े अभिमान से पूछा-कौन हो तुम ? बुद्ध बोले-मैं आत्मविजय का पथिक हूं। ब्रह्यचारी ने उनके कहे शब्दों का अर्थ जानना चाहा तो वे बोले-एक मामूली हथियार निर्माता भी बाण बना लेता है, नौ चालक जहाज पर नियंत्रण रख लेता है, गृह निर्माता घर भी बना लेता है। 


    केवल ज्ञान से ही कुछ नहीं होने वाला है, असल उपलब्धि है निर्मल मन। अगर मन पवित्र नहीं हुआ तो सारा ज्ञान व्यर्थ है। अहंकार से मुक्त व्यक्ति ही ईश्वर को पा सकता है। यह सुनकर ब्रह्यचारी को अपनी भूल का अहसास हो गया।


    Hindi Moral story तीन अजब बातों का गजब चमत्कार 


    न्यायप्रिय राजा हरि सिंह बेहद बुद्धिमान था। वह प्रजा के हर सुख-दुख की चिंता अपने परिवार की तरह करता था। लेकिन कुछ दिनों से उसे स्वयं के कार्य से असंतुष्टि हो रही थी। उसने बहुत प्रयत्न किया कि वह अभिमान से दूर रहे पर वह इस समस्या का हल निकालने में असमर्थ था। 


    एक दिन राजा जब राजगुरु प्रखरबुद्धि के पास गए तो राजगुरू राजा का चेहरा देखते ही उसके मन मे हो रही इस परेशानी को समझ गए। उन्होंने कहा, 'राजन् यदि तुम मेरी तीन बातों को हर समय याद रखोगे तो जिंदगी में कभी भी असफल नहीं हो सकते। 


    प्रखरबुद्धि बोले, 'पहली बात, रात को मजबूत किले में रहना। दूसरी बात, स्वादिष्ट भोजन ग्रहण करना और तीसरी, सदा मुलायम बिस्तर पर सोना।' गुरु की अजीब बातें सुनकर राजा बोला, 'गुरु जी, इन बातों को अपनाकर तो मेरे अंदर अभिमान और भी अधिक उत्पन्न होगा।' इस पर प्रखरबुद्धि मुस्करा कर बोले, 'तुम मेरी बातों का अर्थ नहीं समझे। मैं तुम्हें समझाता हूं। 


    पहली बात-सदा अपने गुरु के साथ रहकर चरित्रवान बने रहना। कभी बुरी आदत के आदी मत होना। । दूसरी बात, कभी पेट भरकर मत खाना जो भी मिले उसे प्रेमपूर्वक खाना। खूब स्वादिष्ट लगेगा। 


    और तीसरी बात, कम से कम सोना। अधिक समय तक जागकर प्रजा की रक्षा करना। जब नींद आने लगे तो राजसी बिस्तर का ध्यान छोड़कर घास, पत्थर, मिट्टी जहां भी जगह मिले वहीं गहरी नींद सो जाना। ऐसे में तुम्हें हर जगह लगेगा कि मुलायम बिस्तर पर हो। बेटा, यदि तुम राजा की जगह त्यागी बनकर अपनी प्रजा का ख्याल रखोगे तो कभी भी अभिमान, धन व राजपाट का मोह तुम्हें नहीं छू पाएगा।' 


    Hindi Moral story नम्र बनो कठोर नहीं 


    एक चीनी संत थे। वह बहुत वृद्ध थे। उन्होंने देखा कि अंत समय निकट आ गया है, तो अपने सभी भक्तों और शिष्यों को अपने पास बुलाया। वह सभी से बोले, थोड़ा मेरे मुंह के अंदर तो देखो भाई? मेरे कितने दांत शेष हैं। 


    प्रत्येक शिष्य ने मुंह के भीतर देखा और प्रत्येक ने कहा कि दांत तो कई वर्षों से समाप्त हो चुके हैं। तब संत ने कहा कि, जिह्वा तो विद्यमान है। सभी ने कहां, 'हां'। संत बोले, 'यह बात कैसे हुई?' 


    जिह्वा तो जन्म के समय भी विद्यमान थी। दांत उससे बहुत बाद में आए। बाद में आने वाले को बाद में जाना चाहिए था। ये दांत पहले कैसे चले गए? 


    तब संत ने थोड़ा रुके और फिर बोले कि यही बतलाने के लिए मैनें तुम्हें यहां बुलाया है। देखो, 'जिह्वा अब तक विद्यमान है, तो इसलिए कि इसमें कठोरता नहीं है। 


    ये दांत बाद में आकर पहले समाप्त हो गए तो इसलिए कि इनमें कठोरता बहुत थी। यह कठोरता ही इनकी समाप्ति का कारण बनी। इसलिए मेरे बच्चों यदि देर तक जीना चाहते हो तो नम्र बनो, कठोर नहीं।' 


    Hindi Moral story हम कल के लिए आज नहीं सोचते 


    एक नगर में एक संपन्न सेठजी रहते थे। वह दिनभर खूब मेहनत से काम करते थे। एक दिन उन्हें न जाने क्या सूझा कि अपने मुनीम को बुलाकर कहा, 'पता करो हमारे पास कितना धन है और कब तक के लिए पर्याप्त है?' 


    कुछ दिन बाद मुनीम हिसाब लेकर आया और सेठ जी से बोला, 'जिस हिसाब से आज खर्चा हो रहा है, उस तरह अगर आज से कोई कमाई न भी हो तो आपकी सात पीढ़ियां खा सकती हैं।' 


    सेठ जी चौंक पड़े। पूछा, 'तब आठवीं पीढ़ी का क्या होगा?' सेठ जी सोचने लगे और तनाव में आ गए। फिर बीमार रहने लगे। बहुत इलाज कराया मगर कुछ फर्क नहीं पड़ा। 


    एक दिन सेठ जी का एक दोस्त हालचाल पूछने आया। सेठजी बोले, 'इतना कमाया फिर भी आठवीं पीढ़ी के लिए कुछ नहीं है। दोस्त बोला, 'एक पंडित जी थोड़ी दूर पर रहते है अगर उन्हें सुबह को खाना खिलाएं तो आपका रोग ठीक हो जाएगा।' 


    अगले ही दिन सेठ जी भोजन लेकर पंडित जी के पास पहुंचे। पंडित जी ने आदर के साथ बैठाया। फिर अपनी पत्नी को आवाज दी, 'सेठ जी खाना लेकर आए हैं।' 


    इस पर पंडित जी की पत्नी बोली, 'खाना तो कोई दे गया है। पंडित जी ने कहा, 'सेठ जी, आज का खाना तो कोई दे गया है। इसलिए आपका भोजन स्वीकार नहीं कर सकते। हमारा नियम है कि सुबह जो एक समय का खाना पहले दे जाए, हम उसे ही स्वीकार करते हैं। मुझे क्षमा करना।' 


    सेठ जी बोले, 'क्या कल के लिए ले आऊं?' पंडित जी बोले, 'हम कल के लिए आज नहीं सोचते। कल आएगा, तो ईश्वर अपने आप भेज देगा।' 


    सेठ जी घर की ओर चल पड़े। रास्‍ते भर वह सोचते रहे कि कैसा आदमी है यह। इसे कल की बिल्कुल भी चिंता नहीं है और मैं अपनी आठवीं पीढ़ी को लेकर रो रहा हूं। उनकी आंखें खुल गईं। सेठ जी सारी चिंता छोड़कर सुख से रहने लगे। 


    Hindi Moral story शर्म नहीं आए तब तक सीखते रहिए 


    यूनानी दार्शनिक अफलातून के पास हर दिन कई विद्वानों का जमावड़ा लगा रहता था। सभी उनसे कुछ न कुछ ज्ञान प्राप्त करके जाया करते थे। लेकिन स्वयं अफलातून खुद को कभी भी ज्ञा�

    अफलातून बोले, तुम्हें किस बात पर शंका है? इस पर मित्र बोला, आप स्वयं इतने बड़े दार्शनिक और विद्वान हैं, लेकिन फिर भी आप दूसरे से शिक्षा ग्रहण करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं, वह भी बड़े उत्साह और उमंग के साथ। उससे भी बड़ी बात यह है कि आपको साधारण व्यक्ति से सीखने में भी झिझक नहीं होती। 


    आपको सीखने की भला क्या जरूरत है? कहीं आप लोगों को खुश करने के लिए उनसे सीखने का दिखावा तो नहीं करते? 


    मित्र की बात पर अफलातून जोर से हंसे और फिर उन्होंने कहा, 'हर किसी के पास कुछ न कुछ ऐसी चीज है जो दूसरों के पास नहीं। इसलिए हर किसी को हर किसी से सीखना चाहिए।' 


    जैसा आचरण वैसा व्यवहार Hindi Moral story 


    एक बार एक स्त्री महाराष्ट्र के महान संत ज्ञानेश्वर महाराज के पास आई। वह अपने छोटे बच्चे को भी साथ लाई। उस स्त्री ने संत से कहा कि मेरे बेटे को अपच की बीमारी है। मैने इसका इलाज कई दवाईयों और औषधियों से किया पर यह ठीक नहीं हुआ। 


    संत ज्ञानेश्वर ने कहा कि 'इसे आप कल लेकर आना। दूसरे दिन जब वह स्त्री लड़के को लेकर संत के पास गई तो, संत ज्ञानेश्वर ने बच्चे से पूछा तुम गुड़ खाते हो, बच्चे ने स्वीकृति में सिर हिलाया। संत ने उस बच्चे से कहा कि तुम गुड खाना बंद कर दो, तुम्हारी बीमारी ठीक हो जाएगी।' 


    स्त्री यह सब बात सुन रही थी। उसने संत ज्ञानेश्वर से पूछा कि 'महाराज आप यह बात कल भी बता सकते थे। लेकिन आपने यह बात कहने के लिए हमें आज ही क्यों बुलाया', तब संत ज्ञानेश्वर बोले कि बहन जब तुम कल मेरे पास आईं, तब मेरे पास गुड़ रखा हुआ था। 


    ऐसे में, में तुम्हारे पुत्र से गुड़ खाने के लिए मना नहीं कर सकता था। यदि में मना करता तो तुम्हारा पुत्र शायद सोचता कि, महाराज स्वयं तो गुड़ का सेवन करते हैं और मुझे मना कर रहे हैं कि इसे मत खाना। यह बात सुनकर उस स्त्री ने संत की महानता से अभिभूत हो गई। 


    Hindi Moral story आत्मा और परमात्मा का दुर्लभ मिलन 


    मिथिला के राजा निमि के बीमार हो गए। उनका पूरा शरीर गर्म होने लगा। राज वैद्यों ने सोच-समझकर कहा कि, महराज के शरीर पर चंदन का लेप किया जाए। तब रानियां अपने हाथों से चंदन घिसने लगीं। 


    चंदन घिसते समय हाथों में पहनी हुई चुड़ियों के टकराने से खन-खन की आवाज होने लगी। वह खन-खनखनाहट की आवाज राजा निमि को अत्यंत परेशानी खड़ी कर रही थी। तब राजा ने कहा 


    यह आवाज मुझे अच्छी नहीं लगती इसे बंद करो।राजा की व्यथा सुनकर रानियों ने एक-एक चूड़ी ही कलायियों में रहने दी और चंदन घिसती रहीं। 


    राजा को रानियों के बारे में पता चल गया कि वो किस तरह से चंदन घिस रहीं हैं। तब राजा ने सोचा कि जब चूड़ियां अनेक थीं और उनका संयोग था कि वो आपस में टकरा जातीं थीं और अशांति महसूस होने लगी। जब एक चूड़ी बची तो शोरगुल बंद हो गया। सचमुच संसार में समस्त अशांति का मूल संयोग ही है। 


    Moral Story कर्म तेरे अच्छे होगें तो भगवान भी तेरा साथ देगें 


    एक बार देवर्षि नारद अपने शिष्य तुम्बुरु के साथ कही जा रहे थे। गर्मियों के दिन थे एक प्याऊ से उन्होंने पानी पिया और पीपल के पेड़ की छाया में बैठे ही थे कि अचानक एक कसाई वहां से 25-30 बकरों को लेकर गुजरा उसमे से एक बकरा एक दुकान पर चढ़कर घांस खाने के लिए दौड़ पड़ा। 


    दुकान शहर के मशहूर सेठ शागाल्चंद सेठ की थी। दुकानदार का बकरे पर ध्यान जाते ही उसने बकरे के कान पकड़कर मारा। बकरा चिल्लाने लगा। दुकानदार ने बकरे को पकड़कर कसाई को सौंप दिया। 


    और कहा कि जब बकरे को तू हलाल करेगा तो इसकी सिर मेरे को देना क्योकि यह मेरी घांस खा गया है देवर्षि नारद ने जरा सा ध्यान लगा कर देखा और जोर से हंस पड़े तुम्बुरु पूछने लगा गुरूजी ! आप क्यों हंसे? 


    उस बकरे को जब मार पड़ रही थी तो आप दू:खी हो गए थे, किन्तु ध्यान करने के बाद आप रंस पड़े इससे क्या रहस्य है ?नारदजी ने कहा यह तो सब कर्मो का फल है 


    इस दुकान पर जो नाम लिखा है 'शागाल्चंद सेठ' वह शागाल्चंद सेठ स्वयं यह बकरा होकर आया है। यह दुकानदार शागाल्चंद सेठ का ही पुत्र है सेठ मरकर बकरा हुआ है और इस दुकान से अपना पुराना सम्बन्ध समझकर घांस खाने गया। 


    उसके बेटे ने ही उसको मारकर भगा दिया। मैंने देखा की 30 बकरों में से कोई दुकान पर नहीं गया। इस बकरे का पुराना संबंध था इसलिए यह गया। 


    इसलिए ध्यान करके देखा तो पता चला की इसका पुराना सम्बन्ध था। जिस बेटे के लिए शागाल्चंद सेठ ने इतना कमाया था, वही बेटा घांस खाने नहीं देता और गलती से खा लिए तो सिर मांग रहा है पिता की यह कर्म गति और मनुष्य के मोह पर मुझे हंसी आ रही है।


    Hindi Story अभिमान से नहीं उदारता से करो दानWith Moral 


    राजा जानुश्रुति अपने समय के महान दानी थे। एक शाम वह महल की छत पर विश्राम कर रहे थे, तभी सफेद हंसों का जोड़ा आपस में बात करता आकाश-मार्ग से गुजरा। 


    हंस अपनी पत्नी से कह रहा था। क्या तुझे राजा जानुश्रुति के शरीर से निकल रहा यश प्रकाश नहीं दिखाई देता। बचकर चल, नहीं तो इसमें झुलस जाएगी। 


    हंसिनी मुस्कराई, प्रिय मुझे आतंकित क्यों करते हो? क्या राजा के समस्त दानों में यश निहित नहीं है, इस लिए मैं ठीक हूं। जबकि संत रैक्व एकांत साधना लीन हैं? उनका तेज देखते ही बनता है। व हीं सच्चे अर्थों में दानी हैं। 


    जानुश्रुति के ह्दय में हंसो की बातचीत कांटों की तरह चुभी। उन्होंने सैनिकों को संत रैक्व का पता लगाने का आदेश दिया। बहुत खोजने पर किसी एकांत स्थान में वह संत अपनी गाड़ी के नीचे बैठे मिले। 


    जानुश्रुति राजसी वैभव से अनेक रथ, घोड़े, गौ और सोने की मुद्राएं लेकर रैक्व के पास पहुंचे। रैक्व ने बहुमूल्य भेटों को अस्वीकार करते हुए कहा कि मित्र यह सब कुछ ज्ञान से तुच्छ है। ज्ञान का व्यापार नहीं होता। 


    राजा शर्मिंदा होकर लौट गए कुछ दिन बाद वह खाली हाथ, जिज्ञासु की तरह रैक्व के पास पहुंचे। रैक्व ने राजा की जिज्ञासा देखकर उपदेश दिया कि दान करो, किंतु अभिमान से नहीं उदारता की, अहं से नहीं, उन्मुक्त भाव से दान करो। राजा रैक्व की बात सुनकर प्रभावित हुए और लौट गए। 


    Hindi Moral story खुशी कुछ पाने से नहीं, बल्कि देने से मिलती है 


    एक आध्यात्मिक गुरु थे। एक आयोजन में उनके अनेक शिष्य आए। गुरु जी ने अपने शिष्यों के लिए एक प्रतियोगिता रखी। हर व्यक्ति को एक गुब्बारा दे दिया और उस पर अपना-अपना नाम लिखने को कहा। सारे गुब्बारे इकट्ठा कर दूसरे कमरे में रख दिए गए। 


    फिर उन लोगों से कहा गया कि वे एक साथ उस कमरे में जाकर अपने नाम का गुब्बारा ढूंढकर लाएं। वही जीतेगा, जो दो मिनट के अंदर अपने नाम का गुब्बारा ले आएगा। प्रतियोगिता शुरू होते ही सभी लोग कमरे की ओर दौड़ पड़े। 


    एक साथ जाने से लोग एक-दूसरे पर ही गिरने लगे। कमरे में अव्यवस्था फैल गई। गुब्बारे फूट गए। फलत: कोई भी व्यक्ति दो मिनट के भीतर अपने नाम का गुब्बारा नहीं ला सका। 


    अबकी बार आयोजकों ने फिर हर व्यक्ति के नाम लिखे गुब्बारे तैयार किए और लोगों से कहा, वे एक-एक करके कमरे में जाएं और कोई भी एक गुब्बारा उठाकर ले आएं और उस पर जिस व्यक्ति का नाम लिखा हो, उसे दे दें। तेजी से काम करने पर दो मिनटों में हर व्यक्ति के हाथ में उसका नाम लिखा गुब्बारा था। 


    अब गुरु जी ने समझाते हुए कहा, 'जीवन में भी आप लोग पागलों की तरह खुशियां तलाश रहे हैं, लेकिन वह इस तरह नहीं मिलती। जब आप दूसरों को खुशियां देने लगेंगे, तो आपको अपनी खुशी मिल जाएगी।' 


    Hindi Moral story अपने हर काम में कुछ इस तरह ढूंढें आनंद 


    एक गांव में कुछ मजदूर पत्थर के खंभे बना रहे थे। उधर से एक संत गुजरे। उन्होंने एक मजदूर से पूछा-यहां क्या बन रहा है? उसने कहा-देखते नहीं पत्थर काट रहा हूं? संत ने कहा-हां, देख तो रहा हूं। लेकिन यहां बनेगा क्या? मजदूर झुंझला कर बोला-मालूम नहीं। 


    यहां पत्थर तोड़ते-तोड़ते जान निकल रही है और इनको यह चिंता है कि यहां क्या बनेगा। साधु आगे बढ़े। एक दूसरा मजदूर मिला। संत ने पूछा-यहां क्या बनेगा? मजदूर बोला-देखिए साधु बाबा, यहां कुछ भी बने। 


    चाहे मंदिर बने या जेल, मुझे क्या। मुझे तो दिन भर की मजदूरी के रूप में 100 रुपए मिलते हैं। बस शाम को रुपए मिलें और मेरा काम बने। मुझे इससे कोई मतलब नहीं कि यहां क्या बन रहा है। साधु आगे बढ़े तो तीसरा मजदूर मिला। साधु ने उससे पूछा-यहां क्या बनेगा? मजदूर ने कहा-मंदिर। 


    इस गांव में कोई बड़ा मंदिर नहीं था। इस गांव के लोगों को दूसरे गांव में उत्सव मनाने जाना पड़ता था। मैं भी इसी गांव का हूं। ये सारे मजदूर इसी गांव के हैं। मैं एक-एक छेनी चला कर जब पत्थरों को गढ़ता हूं तो छेनी की आवाज में मुझे मधुर संगीत सुनाई पड़ता है। मैं आनंद में हूं। 


    कुछ दिनों बाद यह मंदिर बन कर तैयार हो जाएगा और यहां धूमधाम से पूजा होगी। मेला लगेगा। कीर्तन होगा। मैं यही सोच कर मस्त रहता हूं। मेरे लिए यह काम, काम नहीं है। मैं हमेशा एक मस्ती में रहता हूं। मंदिर बनाने की मस्ती में। मैं रात को सोता हूं तो मंदिर की कल्पना के साथ और सुबह जगता हूं तो मंदिर के खंभों को तराशने के लिए चल पड़ता हूं। 


    बीच-बीच में जब ज्यादा मस्ती आती है तो भजन गाने लगता हूं। जीवन में इससे ज्यादा काम करने का आनंद कभी नहीं आया। साधु ने कहा-यही जीवन का रहस्य है मेरे भाई। बस नजरिया का फर्क है।


    Hindi Moral story मन में यदि सुराख है तो उसमें प्रेम कैसे भरेगा 


    गौतम बुद्ध यात्रा पर थे। रास्ते में उनसे लोग मिलते। कुछ उनके दर्शन करके संतुष्ट हो जाते तो कुछ अपनी समस्याएं रखते थे। बुद्ध सबकी परेशानियों का समाधान करते थे। 


    एक दिन एक व्यक्ति ने बुद्ध से कहा-मैं एक विचित्र तरह के द्वंद्व से गुजर रहा हूं। मैं लोगों को प्यार तो करता हूं पर मुझे बदले में कुछ नहीं मिलता। जब मैं किसी के प्रति स्नेह रखता हूं तो यह अपेक्षा तो करूंगा ही कि बदले में मुझे भी स्नेह या संतुष्टि मिले। लेकिन मुझे ऐसा कुछ नहीं मिलता। मेरा जीवन स्नेह से वंचित है। 


    मैं स्वयं को अकेला महसूस करता हूं। कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरे व्यवहार में ही कोई कमी है। कृपया बताएं कि मुझ में कहां गलती और कमी है। बुद्ध ने तुरंत कोई उत्तर नहीं दिया, वे चुप रहे! सब चलते रहे। चलते-चलते बुद्ध के एक शिष्य को प्यास लगी। कुआं पास ही था। 


    रस्सी और बाल्टी भी पड़ी हुई थी। शिष्य ने बाल्टी कुएं में डाली और खींचने लगा। कुआं गहरा था। पानी खींचते-खींचते उसके हाथ थक गए पर वह पानी नहीं भर पाया क्योंकि बाल्टी जब भी ऊपर आती खाली ही रहती। 


    सभी यह देखकर हंसने लगे। हालांकि कुछ यह भी सोच रहे थे कि इसमें कोई चमत्कार तो नहीं? थोड़ी देर में सबको कारण समझ में आ गया। दरअसल बाल्टी में छेद था। बुद्ध ने उस व्यक्ति की तरफ देखा और कहा-हमारा मन भी इसी बाल्टी की ही तरह है जिसमें कई छेद हैं। 


    आखिर पानी इसमें टिकेगा भी तो कैसे? मन में यदि सुराख रहेगा तो उसमें प्रेम भरेगा कैसे। क्या वह रुक पाएगा? तुम्हें प्रेम मिलता भी है तो टिकता नहीं है। तुम उसे अनुभव नहीं कर पाते क्योंकि मन में विकार रूपी छेद हैं। 


    Hindi Story लालची चिड़िया With Moral 


    एक जंगल में पक्षियों का एक बड़ा सा दल रहता था। रोज सुबह सभी पक्षी भोजन की तलाश में निकलते थे। पक्षियों के राजा ने अपने पक्षियों को कह रखा था कि जिसे भी भोजन दिखाई देगा वह आकर अपने बाकी साथियों को आकर बता देगा और फिर सभी पक्षी एक साथ मिलकर दाना खाएंगे। इस तरह उस दल के सभी पक्षियों को भरपूर खाना मिल जाता था। 


    एक दिन भोजन की तालश में एक चिड़िया उड़ते-उड़ते काफी दूर निकल गयी। जंगल के बाहर रास्ते तक आ गई। इस रास्ते से गाड़ियों में अनाज के बोरे मण्डी जाया करते थे। रास्ते में काफी सारा अनाज गाड़ियों से नीचे गिरकर सड़क पर बिखर जाता था। चिड़िया गाड़ियों में अनाज के भरे बोरे देखकर बहुत खुश हुई, क्योंकि अब उसे और कोई जगह तलाश करने की जरूरत ही नहीं थी। अनाज से भरी गाड़ियाँ वहां से रोज गुजरती थीं और अनाज के दाने सड़क पर बिखरते भी रोज थे। चिड़िया के मन में लालच आ गया। उसने सोचा कि उस जगह के बारे में वह किसी को नहीं बतायेगी और रोज इसी जगह आकर पेट भर खाना खाया करेगी। 


    उस शाम को जब चिड़िया अपने दल में वापस पहुँची, तब उसके बाकी साथियों ने देरी से आने का कारण पूछा। 


    चिड़िया ने भी एक अनूठी झूठी कहानी सुना दी कि वह किसी तरह जान बचाकर आयी है। उस रास्ते से तो इतनी गाड़ियाँ गुजरती हैं रास्ता पार करना मुश्किल है। दल की बाकी चिड़िया यह सुनकर डर गयीं और सभी ने निश्चय कर लिया कि वह रास्ते के पास नहीं जाएंगी। 


    इस तरह वह चिड़िया रोज उसी रास्ते पर जाकर पेट भर दाना खाती रही। एक दिन चिड़िया रोज की तरह रास्ते पर बैठकर खाना खा रही थी। खाना खाने में वह इतनी मग्न थी कि उसे उसकी तरफ आती हुई गाड़ी की आहट सुनाई ही नहीं दी। गाड़ी भी तेजी से आगे बढ़ रही थी। चिड़िया दाना चुगने में मग्न थी, गाड़ी पास आ गयी और गाड़ी का पहिया चिड़िया को कुचलता हुआ आगे निकल गया। 


    इस तरह लालची चिड़िया अपने ही जाल में फँस गयी। 


    लालच बुरी बला है-कभी लालची मत बनो !

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    Much obliged to You for read this Top 26 Hindi Moral Story With Picture, on the off chance that these Hindi good story apke pass a66a laga, remark please,,