25 Best Short Moral Story In Hindi ( छोटी नैतिक कहानियां हिंदी में ) With PIcture | Hindi Moral Story

  छोटी-छोटी नैतिक कहानियां ( Short Moral Story In Hindi ) यानी शॉर्ट मोरल स्टोरी हिंदी में पढ़ने के लिए आपको यहां पर सबसे अच्छा छोटे-छोटे कहानियां मिलेगी यह सारे कहानियां नैतिक कहानियां जो हिंदी में लिखी गई है नैतिक कहानियां में जो नीति होता है वह हम सबको जीवन के लिए महत्वपूर्ण है इसलिए यह पर जो सारे नैतिक कहानियां आप पढ़ोगे वह पढ़ कर अपने मन और तन में एक नीति आएगा जिसको इस्तेमाल अपने लाइफ में कर पाओगे.


    Short Moral Story In Hindi सच्ची सेवा

    एक थी बिल्ली। मुरगी के बच्चे उसे बहुत ही भाते थे। रोजाना दो-चार बच्चों को वह कहीं-न-कहीं से खोज-खाजकर खा जाती थी। एक दिन उसे भनक मिली कि एक मुरगी बीमार है। वह हमदर्दी जताने मुरगी के दरबे के पास आई और कहा, ‘‘कहो बहन, कैसी हो ? क्या मैं तुम्हारी ऐसी हालत में तुम्हारे कुछ काम आ सकती हूँ ? तुम्हारी सेवा करना मेरा फर्ज भी तो है।’’

    Short Moral Story In Hindi



    बीमार मुरगी क्षण भर सोचती रही। फिर बोली, ‘‘अगर तुम सचमुच मेरी सेवा करना चाहती हो तो मेरे परिवार से दूर रहो---और अपनी जमातवालों से भी ऐसा ही करने को कहो।’’

    दुश्मन की शुभकामनाओं पर भरोसा नहीं करना चाहिए।


    Short Moral Story In Hindi झरने का पानी

    महात्मा बुद्ध एक बार अपने शिष्य आनंद के साथ कहीं जा रहे थे। वन में काफी चलने के बाद दोपहर में एक वृक्ष तले विश्राम को रुके और उन्हें प्यास लगी।

    आनंद पास स्थित पहाड़ी झरने पर पानी लेने गया, लेकिन झरने से अभी-अभी कुछ पशु दौड़कर निकले थे जिससे उसका पानी गंदा हो गया था। पशुओं की भाग-दौड़ से झरने के पानी में कीचड़ ही कीचड़ और सड़े पत्ते बाहर उभरकर आ गए थे। गंदा पानी देख आनंद पानी बिना लिए लौट आया।

    Short Moral Story In Hindi ( छोटी  नैतिक कहानियां  हिंदी में )


    उसने बुद्ध से कहा कि झरने का पानी निर्मल नहीं है, मैं पीछे लौटकर नदी से पानी ले आता हूं। लेकिन नदी बहुत दूर थी तो बुद्ध ने उसे झरने का पानी ही लाने को वापस लौटा दिया।

    आनंद थोड़ी देर में फिर खाली लौट आया। पानी अब भी गंदा था पर बुद्ध ने उसे इस बार भी वापस लौटा दिया। कुछ देर बार जब तीसरी बार आनंद झरने पर पहुंचा, तो देखकर चकित हो गया। झरना अब बिलकुल निर्मल और शांत हो गया था, कीचड़ बैठ गया था और जल बिलकुल निर्मल हो गया था।

    महात्मा बुद्ध ने उसे समझाया कि यही स्थिति हमारे मन की भी है। जीवन की दौड़-भाग मन को भी विक्षुब्ध कर देती है, मथ देती है। पर कोई यदि शांति और धीरज से उसे बैठा देखता है रहे, तो कीचड़ अपने आप नीचे बैठ जाता है और सहज निर्मलता का आगमन हो जाता है।


    Short Moral Story In Hindi अनमोल वचन व्यर्थ न करें

    एक गांव में सप्ताह के एक दिन प्रवचन का आयोजन होता था। इसकी व्यवस्था गांव के कुछ प्रबुद्ध लोगों ने करवाई थी ताकि भोले-भाले ग्रामीणों को धर्म का कुछ ज्ञान हो सके। इसके लिए एक दिन एक ज्ञानी पुरुष को बुलाया गया। गांव वाले समय से पहुंच गए। ज्ञानी पुरुष ने पूछा – क्या आपको मालूम है कि मैं क्या कहने जा रहा हूं? गांव वालों ने कहा – नहीं तो…।

      ज्ञानी पुरुष गुस्से में भरकर बोले – जब आपको पता ही नहीं कि मैं क्या कहने जा रहा हूं तो फिर क्या कहूं। वह नाराज होकर चले गए। गांव के सरपंच उनके पास दौड़े हुएपहुंचे और क्षमायाचना करके कहा कि गांव के लोग तो अनपढ़ हैं, वे क्या जानें कि क्या बोलना है। किसी तरह उन्होंने ज्ञानी पुरुष को फिर आने के लिए मना लिया।


    अगले दिन आकर उन्होंने फिर वही सवाल किया – क्या आपको पता है कि मैं क्या कहने जा रहा हूं? इस बार गांव वाले सतर्क थे। उन्होंने छूटते ही कहा – हां, हमें पता है कि आप क्या कहेंगे। ज्ञानी पुरुष भड़कगए। उन्होंने कहा -जब आपको पता ही है कि मैं क्या कहने वाला हूं

    तो इसका अर्थ हुआ कि आप सब मुझसे ज्यादा ज्ञानी हैं। फिर मेरी क्या आवश्यकता है? यह कहकर वह चल पड़े। गांव वाले दुविधा में पड़गए कि आखिर उस सज्जन से किस तरह पेश आएं, क्या कहें।

    उन्हें फिर समझा-बुझाकर लाया गया। इस बार जब उन्होंने वही सवाल किया तो गांव वाले उठकर जाने लगे। ज्ञानी पुरुष ने क्रोध में कहा – अरे,मैं कुछ कहने आया हूं तो आप लोग जा रहेहैं। इस पर कुछ गांव वालों ने हाथ जोड़कर कहा – देखिए,आप परम ज्ञानी हैं। हम गांव वाले मूढ़और अज्ञानी हैं। हमें आपकी बातें समझ में नहीं आतीं। कृपया अपने अनमोल वचन हम पर व्यर्थ न करें। ज्ञानी पुरुष अकेले खड़े रह गए।

    उनका घमंड चूरचूर हो गया|




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    Short Moral Story In Hindi गुरु-तोते का संदेश

    एक गांव में एक आदमी अपने तोते के साथ रहता था, एक बार जब वह आदमी किसी काम से दूसरे गांव जा रहा था, तो उसके तोते ने उससे कहा – मालिक, जहाँ आप जा रहे हैं वहाँ मेरा गुरु-तोता रहता है. उसके लिए मेरा एक संदेश ले जाएंगे ?

    क्यों नहीं ! – उस आदमी ने जवाब दिया, तोते ने कहा मेरा संदेश है-:

    आजाद हवाओं में सांस लेने वालों के नाम एक बंदी तोते

    का सलाम | वह आदमी दूसरे गांव पहुँचा और

    वहाँ उस गुरु-तोते को अपने प्रिय तोते का संदेश बताया, संदेश सुनकर गुरु- तोता तड़पा, फड़फड़ाया और मर गया .. जब वह आदमी अपना काम समाप्त कर

    वापस घर आया, तो उस तोते ने पूछा कि क्या उसका संदेश गुरु- तोते तक पहुँच गया था, आदमी ने तोते को पूरी कहानी बताई कि कैसे उसका संदेश सुनकर

    Short Moral Story In Hindi ( छोटी  नैतिक कहानियां  हिंदी में )


    उसका गुरु तोता तत्काल मर गया था | यह बात सुनकर वह तोता भी तड़पा,

    फड़फड़ाया और मर गया | उस आदमी ने बुझे मन से तोते को पिंजरे से बाहरनिकाला और उसका दाह-संस्कार करने के लिए ले

    जाने लगा, जैसे ही उस आदमी का ध्यान थोड़ा भंगहुआ,

    वह तोता तुरंत उड़ गया और जाते जाते उसने अपने मालिक को बताया –

    “मेरे गुरु-तोते ने मुझे संदेश भेजा था कि अगर

    आजादी चाहते हो तो पहले मरना सीखो”. . . . . . . . बस आज का यही सन्देश कि अगर वास्तव में आज़ादी की हवा में साँस लेना चाहते हो तो उसके लिए

    निर्भय होकर मरना सीख लो . . . क्योकि साहस की कमी ही हमें झूठे

    और आभासी लोकतंत्र के पिंजरे में कैद कर के रखती
    हैं”.


    Short Moral Story In Hindi वरदान का इस्तेमाल

    एक बार एक व्यक्ति ने घोर तपस्या करके भगवान को प्रसन्न कर लिया। भगवान ने उसकी तपस्या से प्रसन्न

    होकर उसे वर दिया कि जीवन में एक बार सच्चे मन से जो चाहोगे वही हो जाएगा।

    उस व्यक्ति के जीवन में अनेक अवसर आए, जब वह इस वरदान का इस्तेमाल कर अपने जीवन को सुखी बना सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। कई बार भूखों मरने की नौबत आई, लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ।

    अनेक ऐसे अवसर भी आए, जब वह इस वरदान का प्रयोग कर देश की काया पलट कर सकता था, अथवा समाज को खुशहाल बना सकता था, लेकिन उसने ऐसा भी नहीं किया। वह उस अवसर की तलाश में था जब मौत

    छोटी  नैतिक कहानियां  हिंदी में


    आएगी और वह अपने वरदान का इस्तेमाल कर अमर हो जाएगा और दुनिया को दिखा देगा कि अपने वरदान का उसने कितनी बुद्धिमत्ता से इस्तेमाल किया है। लेकिन मौत तो किसी को सोचने का अवसर देती नहीं। उसने चुपके से एक दिन उसे आ दबोचा। उस का वरदान धरा का धरा रह गया।

    मौत से पहले जी लेने का अर्थ है अपनी सामर्थ्य अथवा इन नेमतों का सदुपयोग कर लेना। और यह बेहद जरूरी है और अभी करना जरूरी है। बाद में तो कोई अवसर मिलने से रहा। ये दौलत, ये बाहुबल, ये सत्ता की ताकत कुछ भी साथ नहीं जाने वाला। जिन के लिए ये सब कर रहे हो उन के भी काम नहीं आने वाला है।


    Short Moral Story In Hindi साथी की उम्मीद

    एक जापानी अपने मकान की मरम्मत के लिए उसकी दीवार को खोल रहा था। ज्यादातर जापानी घरों में लकड़ी की दीवारो के बीच जगह होती है। जब वह लकड़ी की इस दीवार को उधेड़ रहा तो उसने देखा कि वहां दीवार में एक

    छिपकली फंसी हुई थी। छिपकली के एक पैर में कील ठुकी हुई थी।

    उसने यह देखा और उसे छिपकली पर रहम आया। उसने इस मामले में उत्सुकता दिखाई और गौर से उस छिपकली के पैर में ठुकी कील को देखा। अरे यह क्या! यह तो वही कील है जो दस साल पहले मकान बनाते वक्त ठोकी गई थी। यह क्या !!!!

    क्या यह छिपकली पिछले दस सालों से इसी हालत से दो चार है?

    दीवार के अंधेरे हिस्से में बिना हिले-डुले पिछले दस सालों से!! यह नामुमकिन है। मेरा दिमाग इसको गवारा नहीं कर रहा। उसे हैरत हुई। यह छिपकली पिछले दस सालों से आखिर जिंदा कैसे है!!! बिना एक कदम हिले-डुले जबकि इसके पैर में कील ठुकी है!

    उसने अपना काम रोक दिया और उस छिपकली को गौर से देखने लगा। आखिर यह अब तक कैसे रह पाई औरक्या और किस तरह की खुराक इसे अब तक मिल पाई।

    इस बीच एक दूसरी छिपकली ना जाने कहां से वहां आई जिसके मुंह में खुराक थी।

    अरे!!!! यह देखकर वह अंदर तक हिल गया। यह दूसरी छिपकली पिछले दस सालों से इस फंसी हुई छिपकली को खिलाती रही।

    जरा गौर कीजिए वह दूसरी छिपकली बिना थके और अपने साथी की उम्मीद छोड़े बिना लगातार दस साल से उसे

    खिलाती रही। आप अपने गिरेबां में झांकिए क्या आप अपने जीवनसाथी के लिए ऐसी कोशिश कर सकते हैं?

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    Short Moral Story In Hindi बिजली और तूफान की कहानी

    बहुत समय पहले बिजली और तूफान धरती पर मनुष्यों के बीच रहा करते थे। राजा ने उन्हें मनुष्यों की बस्ती से दूर रखा था।

    बिजली तूफान की बेटी थी। जब कभी किसी बात पर बिजली नाराज हो उठती, वह तड़प कर किसी के घर पर गिरती और उसे जला देती या किसी पेड़ को राख कर देती, या खेत की फसल नष्ट कर देती। मनुष्य को भी वह अपनी आग से जला देती थी।

    जब-जब बिजली ऐसा करती, उसके पिता तूफान गरज-गरजकर उसे रोकने की चेष्टा करते। किंतु बिजली बड़ी ढीठ थी। वह पिता का कहना बिलकुल नहीं मानती थी। यहाँ तक कि तूफान का लगातार गरजना मनुष्यों के लिए सिरदर्द हो उठा। उसने जाकर राजा से इसकी शिकायत की।

    राजा को उसकी शिकायत वाजिब लगी। उन्होंने तूफान और उसकी बेटी बिजली को तुरंत शहर छोड़ देने की आज्ञा दी और बहुत दूर जंगलों में जाकर रहने को कहा।

    किंतु इससे भी समस्या का समाधान नहीं हुआ। बिजली जब नाराज होती, जंगल के पेड़ जला डालती। कभी-कभी पास के खेतों का भी नुकसान कर डालती। मनुष्य को यह भी सहन न हुआ। उसने फिर राजा से शिकायत की।

    राजा बेहद नाराज हो उठा। उसने तूफान और बिजली को धरती से निकाल दिया और उन्हें आकाश में रहने की आज्ञा दी, जहाँ से वे मनुष्य का उतना नुकसान नहीं कर सकते थे जितना की धरती पर रहकर करते थे।

    क्रोध का फल बुरा होता है।


    Short Moral Story In Hindi सूअर और लड़के

    दो शहरी लड़के रास्ता भूल गए। अँधेरा बढ़ रहा था, अतः मजबूरन उन्हें एक सराय में रुकना पड़ा।

    आधी रात को एकाएक उनकी नींद उचट गई। उन्होंने पास के कमरे से आती हुई एक आवाज को सुना—‘कल सुबह एक हंडे में पानी खौला देना। मैं उन दोनों बच्चों का वध करना चाहता हूँ।’’

    दोनों लड़कों का खून जम गया।

    ‘हे भगवान !’ वे बुदबुदाए, ‘इस सराय का मालिक तो हत्यारा है !’’ तुरंत उन्होंने वहाँ से भाग जाने का निश्चय किया। कमरे की खिड़की से वे बाहर कूद गए। पर बार पहुँचकर उन्होंने पाया कि बाहर दरवाजे पर ताला लगा हुआ है। अंत में उन्होंने सुअरों के बाड़े में छिपने का निर्णय किया।

    रात भर उन्होंने जागते हुए बिताई। सुबह सराय का मालिक सुअरों के बाड़े में आया। बड़ा सा छुरा तेज किया और पुकारा—‘‘आ जाओ मेरे प्यारे बच्चों, तुम्हारा आखिरी वक्त आ पहुँचा है !’’

    दोनों लड़के भय से काँपते हुए सराय के मालिक के पैरों पर गिर पड़े और गिड़गिड़ाने लगे।

    सराय का मालिक यह देखकर चकित रह गया। फिर पूछा, ‘‘बात क्या है ?’’

    ‘‘हमने रात में आपको किसी से कहते सुना था कि सुबह आप हमें मौत के घाट उतारने वाले हैं।’’ लड़कों ने जवाब दिया।

    सराय का मालिक यह सुनकर हँसा, ‘‘बेवकूफ लड़कों ! मैं तुम लोगों के बारे में नहीं कह रहा था। मैंने तो दो नन्हें सूअरों के बारे में कहा था, जिन्हें मैं इसी तरह पुकारता हूँ।’’

    पूरी बात जाने बिना दूसरों की बातों पर कभी कान नहीं देने चाहिए।


    Short Moral Story In Hindi घंटी की कीमत

    रामदास एक ग्वाले का बेटा था। रोज सुबह वह अपनी गायों को चराने जंगल में ले जाता। हर गाय के गले में एक-एक घंटी बँधी थी। जो गाय सबसे अधिक सुंदर थी उसके गले में घंटी भी अधिक कीमती बँधी थी।

    एक दिन एक अजनबी जंगल से गुजर रहा था। वह उस गाय को देखकर रामदास के पास आया, ‘‘यह घंटी बड़ी प्यारी है ! क्या कीमत है इसकी ?’’

    ‘‘बीस रुपये।’’ रामदास ने उत्तर दिया।

    ‘‘बस, सिर्फ बीस रुपये ! मैं तुम्हें इस घंटी के चालीस रुपये दे सकता हूँ।’’

    सुनकर रामदास प्रसन्न हो उठा। झट से उसने घंटी उतारकर उस अजनबी के हाथ में थमा दी और पैसे अपनी जेब में रख लिये। अब गाय के गले में कोई घंटी नहीं थी। घंटी की टुनक से उसे अन्दाजा हो जाया करता था। अतः अब इसका अन्दाजा लगाना रामदास के लिए मुश्किल हो गया कि गाय इस वक्त कहाँ चर रही है। जब चरते-चरते गाय दूर निकल आई तो अजनबी को मौका मिल गया। वह गाय को अपने साथ लेकर चल पड़ा।

    तभी रामदास ने उसे देखा। वह रोता हुआ घर पहुँचा और सारी घटना अपने पिता को सुनाई। उसने कहा, ‘‘मुझे तनिक भी अनुमान नहीं था कि वह अजनबी मुझे घंटी के इतने अच्छे पैसे देकर ठग ले जाएगा।’’

    पिता ने, ‘‘ठगी का सुख बड़ा खतरनाक होता है। पहले वह हमें प्रसन्नता देता है, फिर दुःख। अतः हमें पहले ही से उसका सुख नहीं उठाना चाहिए।’’

    लालच से कभी सुख नहीं मिलता।


    Short Moral Story In Hindi ज्ञान की प्यास

    उन दिनों महादेव गोविंद रानडे हाई कोर्ट के जज थे। उन्हें भाषाएँ सीखने का बड़ा शौक था। अपने इस शौक के कारण उन्होंने अनेक भाषाएँ सीख ली थीं; किंतु बँगला भाषा अभी तक नहीं सीख पाए थे। अंत में उन्हें एक उपाय सूझा। उन्होंने एक बंगाली नाई से हजामत बनवानी शुरू कर दी। नाई जितनी देर तक उनकी हजामत बनाता, वे उससे बँगला भाषा सीखते रहते।

    रानडे की पत्नी को यह बुरा लगा। उन्होंने अपने पति से कहा, ‘‘आप हाई कोर्ट के जज होकर एक नाई से भाषा सीखते हैं। कोई देखेगा तो क्या इज्जत रह जाएगी ! आपको बँगला सीखनी ही है तो किसी विद्वान से सीखिए।’’

    रानडे ने हँसते हुए उत्तर दिया, ‘‘मैं तो ज्ञान का प्यासा हूँ। मुझे जाति-पाँत से क्या लेना-देना ?’’

    यह उत्तर सुन पत्नी फिर कुछ न बोलीं।

    ज्ञान ऊँच-नीच की किसी पिटारी में बंद नहीं रहता।



    कोयल A Short Moral Story In Hindi

    गरमियों की एक सुबह घनिष्ठ मित्र तोताराम और कल्लू एक जंगल में गए। सहसा उन्हें कोयल की कुहुक सुनाई पड़ी। ‘‘यह एक पक्षी की आवाज है जो किसी मंगल की सूचना देती है।’’

    अंधविश्वासी तोताराम ने कहा, ‘‘मैंने इसकी आवाज सुबह-सुबह सुनी है। मुझे विश्वास है कि आज का दिन बड़ा भाग्यशाली होगा। अवश्य ही मुझे रुपयों से भरा थैला मिलेगा।’’

    ‘‘नहीं !’’ कल्लू ने तोताराम की बात का प्रतिवाद किया, जो उससे भी अधिक वहमी था, ‘‘तुम मुझसे अधिक भाग्यशाली नहीं हो। मुझे विश्वास है, यह आवाज मेरे लिए अधिक भाग्यशाली साबित होगी। तुम देखना, जरूर मुझे अच्छी-खासी रकम प्राप्त होगी।’

    खूबसूरत मौसम का मजा लेने के बजाय वे दोनों इसी बात पर लड़ने लगे। तू-तू, मैं-मैं के बाद हाथापाई पर उतारू हो गए। कुछ ही समय में वे बुरी तरह जख्मी हो गए। दोनों डॉक्टर के पास पहुँचे। डॉक्टर ने उनसे पूछा कि वे आखिर इस स्थिति में पहुँचे कैसे ? सारी घटना बयान करने के बाद उन दोनों ने डॉक्टर से पूछा, ‘‘आप बताएँ कि कोयल ने किसके भाग्यशाली होने की सूचना दी थी ?’’

    डॉक्टर ने हँसते हुए कहा, ‘‘कोयल ने मेरे भाग्यशाली होने की सूचना दी थी। अगर तुम दोनों इसी तरह लड़-झगड़कर हाथ-पैर तोड़ते रहे तो मुझे रुपयों का ढेर तुम्हारे इलाज के एवज में मिलता रहेगा।’’

    बेकार के झगड़े से दूसरों को फायदा होता है।

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    गरीब विधवा A Short Moral Story In Hindi

    विधवा कमला देवी अपनी दो पुत्रियों के साथ बड़ी गरीबी में दिन बिता रही थी। अब तक जो भी जमा-पूँजी उसके पास थी, सब खर्च हो चुकी थी। तिस पर आय का एकमात्र सहारा उसकी गाय भी मर गई। वह बड़ी परेशान थी। आखिर करें क्या ?

    ‘‘बस, एक ही रास्ता है, अगर भगवान् हमें कहीं से एक गाय दे दे।’’

    ‘‘विश्वास और हिम्मत से काम करो, ईश्वर अवश्य तुम्हारी मदद करेगा।’’ उनके पड़ोसी ने उनसे कहा।

    ‘‘पर हम करें क्या ?’’ कमला देवी ने निराशा से भरकर कहा।

    ‘‘तुम अपनी आमदनी बढ़ाओ। तुम सब बहुत अच्छी कढ़ाई-बुनाई जानती हो। प्रतिदिन तीन-चार घंटा यह काम अतिरिक्त करो, ताकि कुछ ऊपरी आमदनी हो सके। उसे जमा करो। दूसरी बात यह कि अपनी चाय का खर्चा कम कर दो। रोज सुबह दलिया बनाकर उसका पानी पियो, जो स्वास्थ्यवर्धक भी होगा और बचत भरा भी। इस तरह जल्दी ही दूसरी गाय खरीदने के लिए पैसे इकट्ठे हो जाएँगे।’’

    कमला देवी और उसकी पुत्रियों ने अपने पड़ोसी के सुझाव के मुताबिक काम करना शुरू कर दिया। साल के अंत में उनके पास इतना पैसा इकट्ठा हो गया कि वे एक अच्छी गाय खरीद सके।

    मेहनत, बचत और समझदारी आदमी के लिए दूसरा ईश्वर है।


    Short Moral Story In Hindi उलटी गंगा

    एक बनिया था। भला था। भोला था। नीम पागल था। एक छोटी सी दुकान चलाता था, दाल, मुरमुरे, रेवड़ी जैसी चीजें बेचता था और शाम तक दाल-रोटी का जुगाड़ कर लेता था।

    एक रोज दुकान बंद कर देर रात वह अपने घर जा रहा था, तभी रास्ते में उसे कुछ चोर मिले। बनिये ने चोरों से पूछा, ‘‘इस वक्त अँधेरे में आप लोग कहाँ जा रहे हैं ?’’

    चोर बोले, ‘‘भैया, हम तो सौदागर हैं। आप हमें क्यों टोक रहे हैं ?’’

    बनिये ने कहा, ‘‘लेकिन एक पहर रात बीतने के बाद आप जा कहाँ रहे हैं ?’’

    चोर बोले, ‘‘माल खरीदने।’’

    बनिये ने पूछा, ‘‘माल नकद खरीदोगे या उधार ?’’

    चोर बोले, ‘‘न नकद, न उधार। पैसे तो देने ही नहीं हैं।’’

    बनिये ने कहा, ‘‘आपका यह पेशा तो बहुत बढ़िया है। क्या आप मुझे भी अपने साथ ले चलेंगे ?’’

    चोर बोले, ‘‘चलिए। आपको फ़ायदा ही होगा।’’

    बनिये ने कहा, ‘‘बात तो ठीक है। लेकिन पहले यह तो बताओ कि यह धंधा कैसे किया जाता है ?’’

    चोर बोले, ‘‘लिखो—किसी के घर के पिछवाड़े...’’

    बनिये ने कहा, ‘‘लिखा।’’

    चोर बोले, ‘‘चुपचाप सेंध लगाना...’’

    बनिये ने कहा, ‘‘लिखा।’’

    चोर बोले, ‘‘फिर दबे पाँव घर में घुसना...’’

    बनिये ने कहा, ‘‘लिखा।’’

    चोर बोले, ‘‘जो भी लेना हो, सो इकट्ठा करना...’’

    बनिये ने कहा, ‘‘लिखा।’’

    चोर बोले, ‘‘न तो मकान मालिक से पूछना और न उसे पैसे देना...’’

    बनिये ने कहा, ‘‘लिखा।’’

    चोर बोले, ‘‘जो भी माल मिले उसे लेकर घर लौट जाना।’’

    बनिये ने सारी बातें कागज पर लिख लीं और लिखा हुआ कागज जेब में डाल लिया। बाद में सब चोरी करने निकले। चोर एक घर में चोरी करने घुसे और बनिया दूसरे घर में चोरी करने पहुँचा। वहाँ उसने ठीक वही किया जो कागज में लिखा था। पहले पिछवाड़े सेंध लगाई। दबे पाँव घर में घुसा। दियासलाई जलाकर दीया जलाया। एक बोरा खोजकर उसमें पीतल के छोटे बड़े बरतन बड़ी बेफ़िक्री से भरने लगा।




    तभी एक बड़ा तसला उसके हाथ से गिरा और सारा घर उसकी आवाज से गूँज उठा। घर के लोग जाग गए।

    सबने ‘चोर-चोर’ चिल्लाकर बनिये को घेर लिया और उसे मारने-पीटने लगे। बनिये को ताज्जुब हुआ। मार खाते उसने अपनी जेब में रखा कागज निकाला और उसे एक नजर पढ़ डाला। फिर तो वह जोश में आ गया। जब सब लोग उसकी मरम्मत कर रहे थे, तब बनिया बोला—

    ‘‘भाइयों, यह तो लिखा-पढ़ी से बिलकुल उलटा हो रहा है। यहाँ तो उलटी गंगा बह रही है।’’

    बनिये की बात सुनकर सब सोच में पड़ गए। मारना-पीटना रोककर सबने पूछा, ‘‘यह तुम क्या बक रहे हो ?’’

    बनिये ने कहा, ‘‘लीजिए, यह कागज देख लीजिए। इसमें कहीं पिटाई का जिक्र है’’ ? घर के लोग तुरंत समझ गए। उन्होंने बनिये को घर से बाहर धकेल दिया।

    सोच-विचारकर किया कार्य कभी कष्टदायक नहीं होता है।


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    Short Moral Story In Hindi मच्छर की कहानी

    क्या तुमको पता है कि केवल मादा मच्छर ही काटती हैं ? खून पीती हैं ?

    बहुत पहले की बात है। वियतनाम के एक गाँव में टॉम और उसकी पत्नी न्हाम रहते थे। टॉम खेती करता था और पत्नी रेशम के कीड़े पालती थी। टॉम बड़ा मेहनती था, पर न्हाम जिंदगी में तमाम ऐशो-आराम की आकांक्षी थी।

    एक दिन न्हाम एकाएक बीमार पड़ गई। टॉम उस वक्त खेतों में काम कर रहा था। जब वह घर लौटा, उसने पाया कि न्हाम अब इस दुनिया में नहीं है। टॉम घुटने टेककर ईश्वर से प्रार्थना करने लगा। तभी उसे आकाशवाणी सुनाई दी कि वह समुद्र के बीच स्थित एक विशाल पहाड़ी पर न्हाम का शव ले जाए।

    कई दिनों की यात्रा के बाद टॉम न्हाम के शव के साथ उस पहाड़ी पर पहुँचा और एक खूबसूरत फूलों के बाग में ले जाकर शव को लिटा दिया। उसकी पलकें थकान से झपक ही रही थीं कि सहसा सफेद बालों तथा तारों-सी चमकती आँखोंवाले एक महापुरुष वहाँ प्रकट हुए। उन महापुरुष ने टॉम से कहा कि वह उनका शिष्य बनकर इसी जगह शांति से रहे। पर टॉम ने कहा कि वह अपनी पत्नी न्हाम को बेहद प्यार करता है और उसके बगैर रह नहीं सकता।

    महापुरुष टॉम की इच्छा जानकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि वह अपनी उँगली काटकर खून की तीन बूँदें न्हाम के शव पर चुआ दे। टॉम ने वैसा ही किया। तभी जादू-सा हुआ। खून की बूँदे पड़ते ही न्हाम उठ बैठी। तब महापुरुष ने न्हाम को चेतावनी दी कि अगर वह ईमानदार और मेहनती नहीं बनेगी तो उसे सजा भुगतनी पड़ेगी। यह कहकर वह महापुरुष वहाँ से अचानक गायब हो गए।

    टॉम और न्हाम नाव पर बैठकर चल दिए। रास्ते में एक गाँव के किनारे उन्होंने नाव रोकी। टॉम खाने-पीने का कुछ सामान खरीदने चला गया। नाव में बैठी न्हाम टॉम के लौटने की प्रतीक्षा कर रही थी। तभी एक विशाल सुसज्जित नाव उसके पास आई। उस नाव का मालिक एक अमीर था। उसने न्हाम को अपनी नाव पर आकर चाय पीने की दावत दी। चायपान खत्म हुआ तो अमीर ने न्हाम से उसकी खूबसूरती की प्रशंसा की और उससे शादी का प्रस्ताव रखा। यह भी वादा किया कि वह उसे अपने महल की एकमात्र रानी बनाकर रखेगा। न्हाम का तो सपना ही था कि वह धनी महिला बने, उसकी सेवा में ढेरों नौकर चाकर हों। वह चट से उस अमीर का प्रस्ताव मान बैठी।

    टॉम जब गाँव से चीजें खरीदकर लौटा तो एक बूढ़े नाविक ने उसे किस्सा सुनाया। टॉम न्हाम की धोखेबाजी से आगबबूला हो उठा। वह फौरन उस अमीर के घर की तरफ रवाना हुआ। कुछ ही दिनों में वह वहाँ जा पहुँचा। उसके महल में पहुँच उसने एक नौकर से प्रार्थना कि कि वह महल के मालिक से मिलना चाहता है। तभी अचानक न्हाम फूल तोड़ने के लिए बगीचे में आई और टॉम को वहाँ देख चकित रह गई। उसने टॉम से कहा कि वह यहाँ बेहद सुखी है और यहाँ से कहीं नहीं जाना चाहती।

    टॉम ने कहा कि वह उसे कतई वापस नहीं ले जाना चाहता। वह तो अपने खून की तीन बूँदें वापस लेने आया है। वह न्हाम उसे लौटा दे। बस !

    न्हाम इस बात से बेहद खुश हुई, ‘चलो खून की तीन बूँदें देकर ही छुटकारा मिल जाएगा।’ ऐसा कहकर उसने तुरंत अपनी एक उँगली में गुलाब का काँटा चुभोया और टॉम की बाँह पर खून टपकाने लगी। जैसे ही खून की तीसरी बूँद गिरी, न्हाम का शरीर सिकुड़ने लगा और वह मादा मच्छर के रूप में तब्दील हो गई। यही न्हाम की सजा थी। वह मादा मच्छर बनकर टॉम के सिर पर मँडराने लगी, जैसे भन्नाकर कह रही हो, ‘मुझे खून लौटा दो ! मैं माफी माँगती हूँ, मैं माफी माँगती हूँ !!’’

    धोखाधड़ी हमें मौत की ओर ले जाती है।


    Short Moral Story In Hindi भला आदमी

    एक धनी पुरुष ने एक मन्दिर बनवाया। मन्दिर में भगवान् की पूजा करने के लिए एक पुजारी रखा। मन्दिर के खर्च के लिये बहुत- सी भूमि, खेत और बगीचे मन्दिर के नाम कर दिए। उन्होंने ऐसा प्रबंध किया था कि जो भूखे, दीन -दुःखी या साधु संत आएँ, वे वहाँ दो- चार दिन ठहर सकें और उनको भोजन के लिए भगवान् का प्रसाद मन्दिर से मिल जाया करे। अब उन्हें एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी, जो मन्दिर की सम्पत्ति का प्रबंध करे और मन्दिर के सब कामों को ठीक- ठीक चलाता रहे।

    बहुत से लोग उस धनी पुरुष के पास आये। वे लोग जानते थे कि यदि मन्दिर की व्यवस्था का काम मिल जाय तो वेतन अच्छा मिलेगा। लेकिन उस धनी पुरुष ने सबको लौटा दिया। वह सबसे कहता, मुझे एक भला आदमी चाहिये, मैं उसको अपने- आप छाँट लूँगा।’

    बहुत से लोग मन ही मन उस धनी पुरुष को गालियाँ देते थे। बहुत लोग उसे मूर्ख या पागल कहते। लेकिन वह धनी पुरुष किसी की बात पर ध्यान नहीं देता था। जब मन्दिर के पट खुलते थे और लोग भगवान् के दर्शनों के लिये आने लगते थे, तब वह धनी पुरुष अपने मकान की छत पर बैठकर मन्दिर में आने वाले लोगों को चुपचाप देखा करता था।

    एक दिन एक व्यक्ति मन्दिर में दर्शन करने आया। उसके कपड़े मैले फटे हुए थे। वह बहुत पढ़ा- लिखा भी नहीं जान पड़ता था। जब वह भगवान् का दर्शन करके जाने लगा, तब धनी पुरुष ने उसे अपने पास बुलाया और कहा- ‘क्या आप इस मन्दिर की व्यवस्था सँभालने का काम स्वीकारकरेंगे?’

    वह व्यक्ति बड़े आश्चर्य में पड़ गया। उसने कहा- ‘मैं तो बहुत पढ़ा- लिखा नहीं हूँ। मैं इतने बड़े मन्दिर का प्रबन्ध कैसे कर सकूँगा?’

    धनी पुरुष ने कहा- ‘मुझे बहुत विद्वान् नहीं चाहिए। मैं तो एक भले आदमी को मन्दिर का प्रबंधक बनाना चाहता हूँ।’

    मैं जानता हूँ कि आप भले आदमी हैं। मन्दिर के रास्ते में एक ईंट का टुकड़ा गड़ा रह गया था और उसका एक कोना ऊपर निकला था। मैं इधर बहुत दिनों से देखता था कि ईंट के टुकड़े की नोक से लोगों को ठोकर लगती थी। लोग गिरते थे, लुढ़कते थे और उठकर चल देते थे। आपको उस टुकड़े से ठोकर नहीं लगी; किन्तु आपने उसे देखकर ही उखाड़ देने का यत्नं किया। मैं देख रहा था कि आप मेरे मजदूर से फावड़ा माँगकर ले गये और उस टुकड़े को खोदकर आपने वहाँ की भूमि भी बराबर कर दी।

    उस व्यक्ति ने कहा- ‘यह तो कोई बड़ी बात नहीं है। रास्ते में पड़े काँटे, कंकड़ और ठोकर लगने वाले पत्थर, ईटों को हटा देना तो प्रत्येक मनुष्य का कर्त्तव्य है।’धनी पुरुष ने कहा- ‘अपने कर्त्तव्य को जानने और पालन करने वाले लोग ही भले आदमी होते हैं।’ मैं आपको ही मंदिर का प्रबंधक बनाना चाहता हूँ।’ वह व्यक्ति मन्दिर का प्रबन्धक बन गया और उसने मन्दिर का बड़ा सुन्दर प्रबन्ध किया।


    धर्म का मर्म Short Moral Story In Hindi

    एक साधु शिष्यों के साथ कुम्भ के मेले में भ्रमण कर रहे थे। एक स्थान पर उनने एक बाबा को माला फेरते देखा। लेकिन वह बाबा माला फेरते- फेरते बार- बार आँखें खोलकर देख लेते कि लोगों ने कितना दान दिया है। साधु हँसे व आगे बढ़ गए।

    आगे एक पंडित जी भागवत कह रहे थे, पर उनका चेहरा यंत्रवत था। शब्द भी भावों से कोई संगति नहीं खा रहे थे, चेलों की जमात बैठी थी। उन्हें देखकर भी साधु खिल- खिलाकर हँस पड़े।

    थोड़ा आगे बढ़ने पर इस मण्डली को एक व्यक्ति रोगी की परिचर्या करता मिला। वह उसके घावों को धोकर मरहम पट्टी कर रहा था। साथ ही अपनी मधुर वाणी से उसे बार- बार सांत्वना दे रहा था। साधु कुछ देर उसे देखते रहे, उनकी आँखें छलछला आईं।

    आश्रम में लौटते ही शिष्यों ने उनसे पहले दो स्थानों पर हँसने व फिर रोने का कारण पूछा। वे बोले-‘बेटा पहले दो स्थानों पर तो मात्र आडम्बर था पर भगवान की प्राप्ति के लिए एक ही व्यक्ति आकुल दिखा- वह, जो रोगी की परिचर्या कर रहा था। उसकी सेवा भावना देखकर मेरा हृदय द्रवित हो उठा और सोचने लगा न जाने कब जनमानस धर्म के सच्चे स्वरूप को समझेगा।’


    ब्रह्मा जी के थैले A Short Moral Story In Hindi

    इस संसार को बनाने वाले ब्रह्माजी ने एक बार मनुष्य को अपने पास बुलाकर पूछा- ‘तुम क्या चाहते हो?’

    मनुष्य ने कहा- ‘मैं उन्नति करना चाहता हूँ, सुख- शान्ति चाहता हूँ और चाहता हूँ कि सब लोग मेरी प्रशंसा करें।’

    ब्रह्माजी ने मनुष्य के सामने दो थैले धर दिये। वे बोले- ‘इन थैलों को ले लो। इनमें से एक थैले में तुम्हारे पड़ोसी की बुराइयाँ भरी हैं। उसे पीठ पर लाद लो। उसे सदा बंद रखना। न तुम देखना, न दूसरों को दिखाना। दूसरे थैले में तुम्हारे दोष भरे हैं। उसे सामने लटका लो और बार- बार खोलकर देखा करो।’

    मनुष्य ने दोनों थैले उठा लिये। लेकिन उससे एक भूल हो गयी। उसने अपनी बुराइयों का थैला पीठ पर लाद लिया और उसका मुँह कसकर बंद कर दिया। अपने पड़ोसी की बुराइयों से भरा थैला उसने सामने लटका लिया। उसका मुँह खोल कर वह उसे देखता रहता है और दूसरों को भी दिखाता रहता है। इससे उसने जो वरदान माँगे थे, वे भी उलटे हो गये। वह अवनति करने लगा। उसे दुःख और अशान्ति मिलने लगी।

    तुम मनुष्य की वह भूल सुधार लो तो तुम्हारी उन्नति होगी। तुम्हें सुख- शान्ति मिलेगी। जगत् में तुम्हारी प्रशंसा होगी। तुम्हें करना यह है कि अपने पड़ोसी और परिचितों के दोष देखना बंद कर दो और अपने दोषों पर सदा दृष्टि रखो।


    A Short Moral Story In Hindi सबसे बड़ा गरीब

    एक महात्मा भ्रमण करते हुए नगर में से जा रहे थे। मार्ग में उन्हें एक रुपया मिला। महात्मा तो विरक्त और संतोषी व्यक्ति थे। वे भला उसका क्या करते? अतः उन्होंने किसी दरिद्र को यह रुपया देने का विचार किया। कई दिन तक वे तलाश करते रहे, लेकिन उन्हें कोई दरिद्र नहीं मिला।

    एक दिन उन्होंने देखा कि एक राजा अपनी सेना सहित दूसरे राज्य पर चढ़ाई करने जा रहा है। साधु ने वह रुपया राजा के ऊपर फेंक दिया। इस पर राजा को नाराजगी भी हुई और आश्चर्य भी। क्योंकि, रुपया एक साधु ने फेंका था इसलिए उसने साधु से ऐसा करने का कारण पूछा।

    साधु ने धैर्य के साथ कहा- ‘राजन्! मैंने एक रुपया पाया, उसे किसी दरिद्र को देने का निश्चय किया। लेकिन मुझे तुम्हारे बराबर कोई दरिद्र व्यक्ति नहीं मिला, क्योंकि जो इतने बड़े राज्य का अधिपति होकर भी दूसरे राज्य पर चढ़ाई करने जा रहा हो और इसके लिए युद्ध में अपार संहार करने को उद्यत हो रहा हो, उससे ज्यादा दरिद्र कौन होगा?’

    राजा का क्रोध शान्त हुआ और अपनी भूल पर पश्चात्ताप करते हुए उसने वापिस अपने देश को प्रस्थान किया।

    प्रेरणाः- हमें सदैव संतोषी वृत्ति रखनी चाहिए। संतोषी व्यक्ति को अपने पास जो साधन होते हैं, वे ही पर्याप्त लगते हैं। उसे और अधिक की भूख नहीं सताती।


    A Short Moral Story In Hindi मनुष्य या पशु

    यह एक सच्ची घटना है। छुट्टी हो गयी थी। सब लड़के उछलते- कूदते, हँसते- गाते पाठशाला से निकले। पाठशाला के फाटक के सामने एक आदमी सड़क पर लेटा था। किसी ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया। सब अपनी धुन में चले जा रहे थे।

    एक छोटे लड़के ने उस आदमी को देखा, वह उसके पास गया। वह आदमी बीमार था, उसने लड़के से पानी माँगा। लड़का पास के घर से पानी ले आया। बीमार ने पानी पीया और फिर लेट गया। लड़का पानी का बर्तन लौटा कर खेलने चला गया।

    शाम को वह लड़का घर आया। उसने देखा कि एक सज्जन उसके पिता को बता रहे हैं कि ‘आज, पाठशाला के सामने दोपहर के बाद एक आदमी सड़क पर मर गया।’ लड़का पिता के पास गया और उसने कहा- ‘बाबूजी! मैंने उसे देखा था। वह सड़क पर पड़ा था। माँगने पर मैंने उसे पानी भी पिलायाथा।’

    इस पर पिता ने पूछा, ‘‘ फिर तुमने क्या किया।’’ लड़के ने बताया- ‘‘फिर मैं खेलने चला गया। ’’

    पिता थोड़ा गम्भीर हुए और उन्होंने लड़के से कहा- ‘तुमने आज बहुत बड़ी गलती कर दी। तुमने एक बीमार आदमी को देखकर भी छोड़ दिया। उसे अस्पताल क्यों नहीं पहुँचाया?

    डरते- डरते लड़के ने कहा- ‘मैं अकेला था। भला, उसे अस्पताल कैसे ले जाता?’

    इस पर पिता ने समझाया -‘‘तुम नहीं ले जा सकते थे तो अपने अध्यापक को बताते या घर आकर मुझे बताते। मैं कोई प्रबन्ध करता। किसी को असहाय पड़ा देखकर भी उसकी सहायता न करना पशुता है।’’

    बच्चो! आप सोचो कि आप क्या करते हो? किसी रोगी, घायल या दुःखिया को देख कर यथाशक्ति सहायता करते हो या चले जाते हो? आपको पता लगेगा कि आप क्या हो- ‘मनुष्य या पशु?


    संतोष का फल Short Moral Story In Hindi

    एक बार एक देश में अकाल पड़ा। लोग भूखों मरने लगे। नगर में एक धनी दयालु पुरुष थे। उन्होंने सब छोटे बच्चों को प्रतिदिन एक रोटी देने की घोषणा कर दी। दूसरे दिन सबेरे बगीचे में सब बच्चे इकट्ठे हुए। उन्हें रोटियाँ बँटने लगीं।

    रोटियाँ छोटी- बड़ी थीं। सब बच्चे एक- दूसरे को धक्का देकर बड़ी रोटी पाने का प्रयत्न कर रहे थे। केवल एक छोटी लड़की एक ओर चुपचाप खड़ी थी। वह सबसे अन्त में आगे बढ़ी। टोकरे में सबसे छोटी अन्तिम रोटी बची थी। उसने उसे प्रसन्नता से ले लिया और वह घर चली गयी।

    दूसरे दिन फिर रोटियाँ बाँटी गयीं। उस लड़की को आज भी सबसे छोटी रोटी मिली। लड़की ने जब घर लौट कर रोटी तोड़ी तो रोटी में से सोने की एक मुहर निकली। उसकी माता ने कहा कि- ‘मुहरउस धनी को दे आओ।’ लड़की दौड़ी -दौड़ी धनी के घर गयी।’’

    धनी ने उसे देखकर पूछा- ‘तुम क्यों आयी हो?’

    लड़की ने कहा- ‘मेरी रोटी में यह मुहर निकली है। आटे में गिर गयी होगी। देने आयी हूँ। आप अपनी मुहर ले लें।’

    धनी बहुत प्रसन्न हुआ। उसने उसे अपनी धर्मपुत्री बना लिया और उसकी माता के लिये मासिक वेतन निश्चित कर दिया। बड़ी होने पर वही लड़की उस धनी की उत्तराधिकारिणी बनी।


    Short Moral Story In Hindi गाली पास ही रह गयी

    एक लड़का बड़ा दुष्ट था। वह चाहे जिसे गाली देकर भाग खड़ा होता। एक दिन एक साधु बाबा एक बरगद के नीचे बैठे थे। लड़का आया और गाली देकर भागा। उसने सोचा कि गाली देने से साधुचिढ़ेगा और मारने दौड़ेगा, तब बड़ा मजा आयेगा लेकिन साधु चुपचाप बैठे रहे। उन्होंने उसकी ओर देखा तक नहीं।

    लड़का और निकट आ गया और खूब जोर- जोर से गाली बकने लगा। साधु अपने भजन में लगे थे। उन्होंने उसकी ओर कोई ध्यान न दिया। तभी एक दूसरे लड़के ने आकर कहा- ‘बाबा जी! यह आपको गालियाँ देता है?’

    बाबा जी ने कहा- ‘हाँ भैया, देता तो है, पर मैं लेता कहाँ हुँ। जब मैं लेता नहीं तो सब वापस लौटकर इसी के पास रह जाती हैं।’

    लड़का बोला- लेकिन यह बहुत खराब गालियाँ देता है।

    साधु- यह तो और खराब बात है। पर मुझे तो वे कहीं नहीं चिपकीं, सब की सब इसी के मुख में भरी हैं। इससे इसका ही मुख गंदा हो रहा है।

    गाली देने वाला लड़का सब सुन रहा था। उसने सोचा, साधु ठीक ही तो कह रहा है। मैं दूसरों को गाली देता हूँ तो वे ले लेते हैं। इसी से वे तिलमिलाते हैं, मारने दौड़ते हैं और दुःखी होते हैं। यह गाली नहीं लेता तो सब मेरे पास ही तो रह गयीं। लड़का मन ही मन बहुत शर्मिंदा हुआ और सोचने लगा छिःमेरे पास कितनी गंदी गालियाँ हैं। वह साधु के पास गया, क्षमा माँगी और बोला- बाबाजी! मेरी यह गंदी आदत कैसे छूटे और मुख कैसे शुद्ध हो?

    साधु ने समझाया -‘पश्चात्ताप करने तथा फिर ऐसा न करने की प्रतिज्ञा करने से बुरी आदत दूर हो जायेगी। मधुर वचन बोलने और भगवान् का नाम लेने से मुख शुद्ध हो जायेगा।’


    बड़ की बात मानो Short Moral Story In Hindi

    एक बहुत घना जंगल था, उसमें पहाड़ थे और शीतल निर्मल जल के झरने बहते थे। जंगल में बहुत- से पशु रहते थे। पर्वत की गुफा में एक शेर- शेरनी और इन के दो छोटे बच्चे रहते थे। शेर और शेरनी अपने बच्चों को बहुत प्यार करते थे।

    जब शेर के बच्चे अपने माँ बाप के साथ जंगल में निकलते तो उन्हें बहुत अच्छा लगता था। लेकिन शेर- शेरनी अपने बच्चों को बहुत कम अपने साथ ले जाते थे। वे बच्चों को गुफा में छोड़कर वन में अपने भोजन की खोज में चले जाया करते थे।

    शेर और शेरनी अपने बच्चों को बार- बार समझाते थे कि वे अकेले गुफा से बाहर भूलकर भी न निकलें। लेकिन बड़े बच्चे को यह बात अच्छी नहीं लगती थी। एक दिन शेर- शेरनी जंगल में गये थे, बड़े बच्चे ने छोटे से कहा- चलो झरने से पानी पी आएँ और वन में थोड़ा घूमें। हिरनों को डरा देना मुझे बहुत अच्छा लगता है।

    छोटे बच्चे ने कहा- ‘पिता जी ने कहा है कि अकेले गुफा से मत निकलना। झरने के पास जाने को बहुत मना किया है। तुम ठहरो पिताजी या माताजी को आने दो। हम उनके साथ जाकर पानी पीलेंगे।’
    बड़े बच्चे ने कहा- ‘मुझे प्यास लगी है। सब पशु तो हम लोगों से डरते ही हैं। फिर डरने की क्या बातहै?’

    छोटा बच्चा अकेला जाने को तैयार नहीं हुआ। उसने कहा- ‘मैं तो माँ- बाप की बात मानूँगा। मुझे अकेला जाने में डर लगता है।’ बड़े भाई ने कहा। ‘तुम डरपोक हो, मत जाओ, मैं तो जाता हूँ।’ बड़ा बच्चा गुफा से निकला और झरने के पास गया। उसने पेट भर पानी पिया और तब हिरनों को ढकतेहुए इधर- उधर घूमने लगा।

    जंगल में उस दिन कुछ शिकारी आये हुए थे। शिकारियों ने दूर से शेर के बच्चे को अकेले घूमते देखा तो सोचा कि इसे पकड़कर किसी चिड़िया घर में बेच देने से अच्छे रुपये मिलेंगे। शिकारियों ने शेर के बच्चे को चारों ओर से घेर लिया और एक साथ उस पर टूट पड़े। उन लोगों ने कम्बल डालकर उस बच्चे को पकड़ लिया।

    बेचारा शेर का बच्चा क्या करता। वह अभी कुत्ते जितना बड़ा भी नहीं हुआ था। उसे कम्बल में खूब लपेटकर उन लोगों ने रस्सियों से बाँध दिया। वह न तो छटपटा सकता था, न गुर्रा सकता था।

    शिकारियों ने इस बच्चे को एक चिड़िया घर को बेच दिया। वहाँ वह एक लोहे के कटघरे में बंद कर दिया गया। वह बहुत दुःखी था। उसे अपने माँ- बाप की बहुत याद आती थी। बार- बार वह गुर्राताऔर लोहे की छड़ों को नोचता था, लेकिन उसके नोचने से छड़ तो टूट नहीं सकती थी।

    जब भी वह शेर का बच्चा किसी छोटे बालक को देखता तो बहुत गुर्राता और उछलता था। यदि कोई उसकी भाषा समझा सकता तो वह उससे अवश्य कहता- ‘तुम अपने माँ- बाप तथा बड़ों की बात अवश्य मानना। बड़ों की बात न मानने से पीछे पश्चात्ताप करना पड़ता है। मैं बड़ों की बात न मानने से ही यहाँ बंदी हुआ हूँ।’

    सच है- जे सठ निज अभिमान बस, सुनहिं न गुरुजन बैन।
    जे जग महँ नित लहहिं दुःख, कबहुँ न पावहिं चैन॥


    Short Moral Story In Hindi स्वच्छता

    एक किसान ने एक बिल्ली पाल रखी थी। सफेद कोमल बालों वाली बिल्ली। रात को वह किसान की खाट पर ही उसके पैरों के पास सो जाती थी। किसान जब खेत पर से घर आता तो बिल्ली उसके पास दौड़ कर जाती और उसके पैरों से अपना शरीर रगड़ती, म्याऊँ -म्याऊँ करके प्यार दिखलाती। किसान अपनी बिल्ली को थोड़ा सा दूध और रोटी देता था।

    किसान का एक लड़का था। वह बहुत आलसी था। रोज नहाता भी नहीं था। एक दिन किसान के लड़के ने अपने पिता से कहा- ‘पिता जी! आज रात को मैं आपके साथ सोऊँगा।’

    किसान बोला- ‘नहीं! तुम्हें अलग खाट पर ही सोना चाहिये।’

    लड़का कहने लगा- ‘बिल्ली को तो आप अपनी ही खाट पर सोने देते हैं, परंतु मुझे क्यों नहीं सोनेदेते?’

    किसान ने कहा- ‘तुम्हें खुजली हुई है। तुम्हारे साथ सोने से मुझे भी खुजली हो जायेगी। पहले तुम अपनी खुजली अच्छी होने दो।’

    लड़का- खुजली से बहुत तंग था। उसके पूरे शरीर में छोटे- छोटे फोड़े- जैसे हो रहे थे। खुजली के मारे वह बेचैन रहता था। उसने अपने पिता से कहा- यह खुजली मुझे ही क्यों हुई है? इस बिल्ली को क्यों नहीं हुई?

    किसान बोला- ‘कल सबेरे तुम्हें यह बात बताऊँगा।’ दूसरे दिन सबेरे किसान ने बिल्ली को कुछ अधिक दूध और रोटी दी, लेकिन जब बिल्ली का पेट भर गया तो वह दूध- रोटी छोड़कर दूर चली गयी और धूप में बैठकर बार- बार अपना एक पैर चाटकर अपने मुँह पर फिराने लगी।

    किसान ने अपने लड़के को वहाँ बुलाया और बोला- ‘देखो, बिल्ली कैसे अपना मुँह साफ कर रही है। यह इसी प्रकार अपना सब शरीर स्वच्छ रखती है। इसीसे इसे खुजली नहीं होती। तुम अपने कपड़े और शरीर को मैला रखते हो,इस कारण तुम्हें खुजली हुई है। मैल में एक प्रकार का विष होता है। वह पसीने के साथ जब शरीर की चमड़ी में लगता है और भीतर जाता है, तब खुजली, फोड़े और दूसरे भी कई रोग हो जाते हैं।

    लड़के ने कहा- ‘मैं आज सब कपड़े गरम पानी में उबालकर धोऊँगा। बिस्तर और चद्दर भी धोऊँगा। खूब नहाऊँगा। पिता जी! इससे मेरी खुजली दूर हो जायेगी।’

    किसान ने बताया- ‘शरीर के साथ पेट भी स्वच्छ रखना चाहिये। देखो, बिल्ली का पेट भर गया तो उसने दूध भी छोड़ दिया। पेट भर जाने पर फिर नहीं खाना चाहिये। ऐसी वस्तुएँ भी नहीं खानी चाहिये, जिनसे पेट में गड़बड़ी हो। मिर्च, खटाई, बाजार की चाट, अधिक मिठाइयाँ खाने और चाय पीने से पेट में गड़बड़ी हो जाती है। इससे पेट साफ नहीं रहता। पेट साफ न रहे तो बहुत से रोग होते हैं। बुखार भी पेट की गड़बड़ी से आता है। जो लोग जीभ के जरा से स्वाद के लिये बिना भूख ज्यादा खा लेते हैं अथवा मिठाई, घी में तली हुई चीजें, दही- बड़े आदि बार- बार खाते रहते हैं, उनको और भी तरह- तरह की बीमारियाँ हो जाती हैं। पेट साफ करने के लिये चोकर मिले आटे की रोटी, हरी सब्जी तथा मौसमी- सस्ते फल अधिक खाने चाहिये।’

    किसान के लड़के ने उस दिन से अपने कपड़े स्वच्छ रखने आरम्भ कर दिये। वह रोज शरीररगड़कर स्नान करता। वह इस बात का ध्यान रखता कि ज्यादा न खाए तथा कोई ऐसी वस्तु न खाए, जिससे पेट में गड़बड़ी हो। उसकी खुजली अच्छी हो गयी। वह चुस्त, शरीर का तगड़ा और बलवान् हो गया। उसके पिता और दूसरे लोग भी अब उसे बड़े प्रेम से अपने पास बैठाने लगे..


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